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MASLAK e ALA HAZRAT ZINDABAD

दसवां महीना — शव्वालुल मुकर्रम

इस्लामी महीना का नाम शव्वालुल मुकर्रम है। इस महीना में भी अरब के लोग सैर व सियाहत और शिकार खेलने के लिये अपने घरों से बाहर चले जाते थे। इस लिये इस का नाम शव्वाल रखा गया। इस महीना की पहली तारीख को ईदुलफित्र होती है। जिसको यौमुर्रहमा भी कहते हैं। क्योंकि उस दिन अल्लाह तआला अपने बन्दों पर रहमत फरमाता है। और इसी रोज़ अल्लाह तआला ने शहद की मक्खी को शहद बनाने का अलहाम किया था। और इसी दिन अल्लाह तआला ने जन्नत पैदा फरमाई। और इसी रोज़ अल्लाह तबारक व तआला ने दरख्त तूबा पैदा किया। और इसी दिन को अल्लाह जल्ल ने सैयदना जिबरिल अलैहिस्सलातो वस्सलाम को वही के लिये मुन्तखब फरमाया और इसी दिन फिरऔन के जादूगरों ने तौबा की थी।

और इसी महीना की चौथी तारीख को सैयदुल आलमीन रहमतुल लिल आलमीन सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम नजरान के नसरानियों के साथ मुकाबला के लिये निकले थे। और इसी माह की सतरहवीं तारीख को उहद की लड़ाई शुरू हुई। जिसमें सैयदुश्शोहदा हज़रत अमीर हम्ज़ा रज़ी अल्लाह तआला अन्हो शहीद हुये थे और इसी माह की पचीस तारीख से आखिर माह तक जितने दिन हैं वह कौम आद के मनहूस दिन थे जिनमें अल्लाह जल शानुहू ने कौम आद को हलाक फरमाया था। शव्वाल की फज़ीलत : यह मुबारक महीना वह है जो हज के महीनों का पहला महीना, उसे शहरुल फित्र भी कहते हैं। उसकी पहली तारीख को ईदुल फित्र होती है। जिसमें अल्लाह तआला अपने बन्दों को बख्शिश का मुज़दा सुनाता है। जैसा कि हदीस शरीफ में है।

जब ईद का दिन आता है यानि ईदुल फित्र का दिन तो अल्लाह तबारक व तआला अपने बन्दों से फरिश्तों पर फख़्र फरमाता है। पस फरमाता है कि उस मज़दूर की क्या मज़दूरी है जिसने अपना काम पूरा किया हो। फरिश्ते अर्ज़ करते हैं कि ऐ हमारे परवरदिगार उसकी जज़ा यह है कि उसे पूरा अज्र दिया जाये। अल्लाह तबारक व तआला फरमाता है ऐ मेरे फरिश्तो! मेरे बन्दों और बांदियों ने मेरे इस फरीज़ा को जो उन के ज़िम्मा लाज़िम आता था अदा कर दिया है। फिर वह (ईदगाह की तरफ) निकले दुआ के लिये पुकारते हुये। और मुझे इज़्ज़त व जलाल और करम और बुलंदी मरतबा की कसम मैं उनकी दुआ क़ुबूल करूँगा। पस फरमाता है ऐ मेरे बन्दो! लौट जाओ मैंने तुम्हें बख्श दिया और तुम्हारी बदियां नेकियों से बदल दीं। हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि लोग उस हाल में वापस लौटते हैं कि उन की बख्शिश हो चुकी होती है।

ईदुल फित्र के काम : ईद के रोज़ यह काम मुस्तहब हैं 1— हजामत बनवाना 2— नाखुन तरशवाना 3— गुस्ल करना 4— मिस्वाक करना 5— अच्छे कपड़े पहनना। नया हो तो नया वर्ना धुला हुआ 6— अंगूठी पहनना 7— खुशबू लगाना 8— सुब्ह की नमाज़ मोहल्ला की मस्जिद में अदा करना 9— ईदगाह में जल्दी जाना 10— नमाज़ से पहले सदका फित्रा अदा करना जो सवा दो सेर गंदुम है 11— ईदगाह को पैदल जाना 12— दूसरे रास्ते से वापस आना

13नमाज़ को जाने से पहले चन्द खजूरें खा लेना। तीन या पांच या कम व बेश मगर ताक हों। खजूरें न हों तो कोई मीठी चीज़ खा ले। नमाज़ से पहले कुछ ना खाया तो गुनाहगार होगा। मगर इशा तक ना खाया तो अताब किया जायेगा।

सैयदना हज़रत अनस रज़ी अल्लाहो अन्हो फरमाते हैं हुज़ूर नबी करीम रऊफ रहीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ईदुल फित्र के दिन जब तक कुछ मीठी चीज़ नहीं खा लेते। ताक जैसे एक या तीन या पांच खजूरें तबतक ईदगाह की तरफ नहीं जाते थे।

14ख़ुशी ज़ाहिर करना 15) कसरत से सदका देना 16) ईदगाह को इतमेनान वकार और नीची निगाह किये जाना 17) आपस में मुबारकबाद देना मुस्तहब है।

मसला : नमाज़े ईद से पहले नफल नमाज़ मुतलकन मकरूह है ईदगाह में हो या घर में ख्वाह उसपर ईद की नमाज़ वाजिब हो या ना हो यहां तक कि औरत अगर चाश्त की नमाज़ घर में पढ़ना चाहे तो नमाज़ ईद हो जाने के बाद पढ़े। और नमाज़ ईद के बाद ईदगाह में नफिल पढ़ना मकरूह है घर में पढ़ सकता है।

शव्वाल के छह रोज़े :

शव्वाल में छह रोज़े रखना बड़ा सवाब है। जिस मुसलमान ने रमज़ान मुबारक के बाद छह दिन शव्वाल के रोज़े रखे तो इसने गोया सारे साल के रोज़े रखे। यानि पूरे साल के रोज़ों का सवाब मिलता है।

सैयदना हज़रत अबु अय्यूब अन्सारी रज़ी अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है हुज़ूर रहमतुल लिल आलमीन सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि

जिस आदमी ने रमज़ान शरीफ के रोज़े रखे और फिर उनके साथ छह रोज़े शव्वाल के मिलाये तो उसने गोया तमाम उम्र रोज़े रखे।

यह तमाम उम्र वाला मसला उस वक्त है जबकि वह शव्वाल के छह रोज़े तमाम उम्र रखे और अगर उसने सिर्फ एक ही साल यह रोज़े रखे तो सिर्फ साल के रोज़ों का सवाब मिलेगा। फिर यह छह रोज़े इकट्ठे रखे या अलग अलग हर तरह जायज़ हैं बेहतर यह कि उनको मुतफर्रिक तौर पर रखा जाये। यही हन्फी मज़हब है। अश्अतुल लमहात

शव्वाल की नफिल : यह हदीस शरीफ में है कि जो मुसलमान शव्वाल की पहली रात या दिन में नमाज़ ईद के बाद चार रिकअत में अलहमदु शरीफ के बाद कुलहुअल्लाह अहद इक्कीस मरतबा पढ़े तो अल्लाह तआला उसके लिये बहिश्त के आठों दरवाज़े खोल देगा। और दोज़ख के सातों दरवाज़े उसपर बन्द कर देगा। और तब तक न मरेगा कि जबतक अपना मकान जन्नत में ना देख लेगा।

दूसरी रिवायत में है कि माहे शव्वाल में रात को या दिन को आठ रिकअत पढ़े और हर रिकअत में अलहमदु शरीफ के बाद कुलहुअल्लाहो अहद पचीस मरतबा पढ़े फिर सलाम फेर कर सत्तर दफा सुब्हानल्लाह और सत्तर दफा यह दरूद पढ़े अल्लाहुम्मा सल्ले अला मोहम्मदिन नबीइल उम्मीइ व अला आलेही सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम तो अल्लाह तआला उसके वास्ते जन्नत में एक बड़ा मकान बनायेगा कि उससे बड़ा मकान किसी और का ना होगा।