नौवां महीना — रमज़ानुल मुबारक
रमज़ान गर्मी की शिद्दत को कहते हैं रमज़ान इसी से मुश्तक है यह महीना अकसर सख्त गर्मियों में पड़ता था नाम रखने के वक्त मौसम निहायत गर्म था इसी मुनासबत से इस महीना का नाम रमज़ान रखा गया।
रमज़ानुल मुबारक तारीख की रोशनी में
रमज़ानुल मुबारक में मुन्दर्जा ज़ैल वाकआत पेश आये एक रमज़ान को जन्नत के दरवाज़े खोल दिये जाते हैं और दोज़ख के दरवाज़े बन्द कर दिये जाते हैं और शैतानों को जंजीरों में जकड़ दिया जाता है रमज़ान की तीसरी तारीख को सैयदना हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर सहायफ नाज़िल हुये।
रमज़ान की छह तारीख को सैयदना मूसा अलैहिस्सलाम पर तौरैत नाज़िल हुई रमज़ान की अट्ठारह तारीख को सैयदना हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम पर ज़बूर नाज़िल हुई रमज़ान की तेरह तारीख को सैयदना हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम पर इन्जील शरीफ नाज़िल हुई।
रमज़ान की सत्ताइस तारीख को इमामुल अंबिया वलमुरसलीन अहमद मुजतबा मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम पर कुरआन नाज़िल हुआ।
सतरह रमज़ानुल मुबारक को मक्का मुकर्रमा फतेह हुआ।
सत्ताइसवीं रमज़ानुल मुबारक को जंग बदर हुई और नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की मदद के लिये फरिश्ते नाज़िल हुए। रमज़ानुल मुबारक के आखिरी दिन में इतने लोगों को दोज़ख से आज़ाद किया जाता है जितना कि अव्वल रमज़ान से आखिर रमज़ान तक आज़ाद होते हैं।
फज़ीलत रमज़ान :- रमज़ानुल मुबारक तमाम महीनों से अफज़ल है इब्ने जौज़ी रहमतुल्लाह तआला अलैहि बिस्तानुल वाइज़ीन में फरमाते हैं कि जिस तरह सैयदना हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलातो वस्सलाम के बारह बेटों में से सैयदना हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम अपने वालिद माजिद को ज़्यादा महबूब थे इसी तरह साल के बारह महीनों में से रमज़ान शरीफ अल्लाह तबारक व तआला को ज़्यादा महबूब है।
और जिस तरह अल्लाह करीम ने सैयदना हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलातो वस्सलाम के वास्ते बाकी ग्यारह भाईयों की मगफिरत फरमाई है इसी तरह रमज़ान मुबारक की बरकत से ग्यारह महीनों की खताएं माफ फरमायेगा।
गर्जकि रमज़ान शरीफ की फज़ीलत का क्या पूछना यह मुबारक महीना है कि जिसकी आमद पर जन्नत के दरवाज़े खुल जाते हैं और दोज़ख के दरवाज़े बन्द हो जाते हैं और शैतानों को जंजीरों से जकड़ दिया जाता है रहमतुल आलमीन सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम फरमाते हैं।
जब रमज़ान शरीफ तशरीफ लाता है तो आसमान के दरवाज़े खोले जाते हैं और दोज़ख के दरवाज़े बन्द किये जाते हैं और शैतान ज़न्जीरों में जकड़ दिये जाते हैं। और एक रिवायत में है कि रहमत के दरवाज़े खुल जाते हैं।
सुबहान अल्लाह! रमज़ान मुबारक की क्या अज़मत व शान है कि इस की आमद के लिये जन्नत को सजाया जाता है। और हूरें मुज़य्यन व आरास्ता होकर अपने अपने खाविन्दों को प्यारे प्यारे अलफाज़ से बुलाती हैं।
सैयदना हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ी अल्लाह तआला अन्हो से रिवायत है कि आक़ाए रहमत सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया
बेशक जन्नत इब्तेदाये साल से आइन्दा साल तक रमज़ान शरीफ के लिये आरास्ता की जाती है फरमाया जब पहला दिन आता है तो जन्नत के पत्तों से अर्श के नीचे हवा बड़ी आँखों वाली हूरें चलती तो वह कहती हैं कि ऐ परवरदिगार अपने बन्दों से हमारे लिये उनको शौहर बना जिनसे हमारी आँखें ठंडी हों और उनकी आँखें हमसे ठंडी हों।
माहे रमज़ान की फज़ीलत का क्या कहना कि उसकी बरकत से रमज़ान मुबारक की हर रात में साठ हज़ार गुनाहगारों की मगफरत की जाती है सैयदुल अंबिया वलमुरसलीन सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम फरमाते हैं।
रमज़ानुल मुबारक की हर रात में एक मुनादी आसमान से तुलू सुब्ह तक यह निदा करता रहता है कि ऐ खैर के तलबगार तमाम कर और खुश हो जाये बुराई के चाहने वाले रुक जा और इबरत हासिल कर क्या कोई बख्शिश मांगने वाला है कि उसकी बख्शिश की जाये। क्या कोई तौबा करने वाला है कि इसकी तौबा क़ुबूल की जाये। क्या कोई दुआ मांगने वाला है कि उसकी दुआ क़ुबूल की जाये। क्या कोई सवाली है कि उसका सवाल पूरा किया जाये। अल्लाह बुज़ुर्ग व बरतर रमज़ान शरीफ की हर रात में इफ्तारी के वक्त साठ हज़ार गुनाहगार दोज़ख का दिन आता है तो अल्लाह तआला इतने लोगों को आज़ादी फरमाता है कि जितने तमाम महीने में आज़ाद फरमाता है। तीस मरतबा साठ साठ हजार। ः
इसी तरह सैयदना हज़रत अबु हुरैरह रज़ी अल्लाहो तआला अन्हो से मर्वी है कि सरकार दो आलम रहमतुल लिलआलमीन शफीउल मुज़नबीन सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया :
रमज़ान पाक की आखिरी रात में मेरी उम्मत की बख्शिश की जाती है। अर्ज़ की गई या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम क्या वह शबे कद्र है। फरमाया नहीं लेकिन काम करने वाले का अज्र पूरा दिया जाता है जबकि वह अपना काम खत्म करता है।
जिसने रमज़ान का कदर नहीं जाना वह हलाक होगा
जिस बदकिस्मत ने रमज़ान पाक का कदर नहीं किया और उसमें नेक अमल करके अपनी बख्शिश नहीं कराई उसने अपने आप को हलाक के गढ़े में डाल दिया है। महबूब खुदा हबीब किब्रिया रोज़ जज़ा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि
तुम लोग मिम्बर के पास हाज़िर हो पस हम मिम्बर के पास हाज़िर हुये जब हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम मिम्बर के पहले दर्जे पर चढ़े तो फरमाया आमीन। जब दूसरे दर्जे पर चढ़े तो फरमाया आमीन। और जब तीसरे दर्जे पर चढ़े तो फरमाया आमीन। जब मिम्बर शरीफ से उतरे तो हमने अर्ज़ की या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम आज हमने आपसे ऐसी बात सुनी कि कभी न सुने थे। फरमाया बेशक जिबरील अलैहिस्सलाम ने आकर अर्ज़ की के बेशक वह शख्स दूर हो (रहमत से या हलाक हो) जिसने रमज़ान शरीफ को पाया और उसकी मगफिरत नहीं हुई।
मैंने कहा आमीन। जब मैं दूसरे दर्जे पर चढ़ा तो उसने कहा कि वह शख्स दूर हो जिसके पास तेरा ज़िक्र हुआ हो और वह दरूद शरीफ न पढ़े मैंने कहा आमीन।
जब मैं तीसरे दर्जे पर चढ़ा तो उसने कहा कि दूर हो वह शख्स जिसके माँ बाप दोनों या एक को उसके सामने बुढ़ापा आये और वह उसको जन्नत में दाखिल न करायें। मैंने कहा आमीन।
इस हदीस शरीफ में है कि सैयदना जिबरील अलैहिस्सलातो वस्सलाम ने बारगाहे मुस्तफा में तीन बददुआएं कीं। और सैयदुल आलमीन रहमतुल आलमीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन तीनों बददुआओं पर आमीन फरमाई।
अव्वल तो सैयदना हज़रत जिबरील अलैहिस्सलातो वस्सलाम की बददुआ कुछ कम ना थी फिर सैयदुल आलमीन रहमतुल आलमीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की आमीन ने उस बददुआ पर मुहर सब्त फरमा कर और सख्त बना दिया। अल्लाह करीम अपने हबीब पाक साहब लौलाक सल्लल्लाहु अंलैहि वसल्लम के सदका में हम गुनाहगारों को उन तीनों बददुआओं से महफूज़ फरमाये आमीन। वरना हलाकत में क्या शक व शुबा है। एक शख्स जिसके लिये बददुआ की गई वह है कि जिसके सामने हुज़ूर सरापा नूर शाफेए यौमुनशूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का नाम लिया जाये और वह आप पर दरूद ना पढ़े तो ऐसा शख्स अपने आप को हलाकत के गढ़े में डालता है और अल्लाह बुज़ुर्ग व बरतर की रहमत से दूर हो जाता है। इसी वजह से बाज उल्माये केराम के नज़दीक हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम व बारिक व सल्लम के नाम मुबारक पर दरूद शरीफ पढ़ना वाजिब है। ख्वाह नाम मुबारक जितनी मरतबा मज़कूर हो। इसके अलावा हदीस शरीफ में ऐसे शख्स को शक़ी और बखील लोगों की फेहरिस्त में दाखिल किया गया है।
एक हदीस पाक में यहां तक वारिद है कि ऐसा शख्स रहमतुल आलमीन शफीउल मुज़नबीन सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के जमाल पाक की ज़ियारत से महरूम रहेगा जब मुसलमान आप की ज़ियारत से मुशर्रफ होंगे।
दूसरा शख्स जिसके हक में बददुआ की गई वह है कि जिसके माँ बाप दोनों या एक बूढ़े मौजूद हों और वह उनकी खिदमत न करे तो इसकी हलाकत व बदनसीबी में कोई शुबा नहीं। एक हदीस शरीफ में है कि फरमाबरदार बेटे की मोहब्बत की निगाह वालिद की तरफ एक मकबूल हज का सवाब रखती है, जितनी मरतबा वालिद को मोहब्बत की निगाह से देखेगा इतने ही मकबूल हजों का सवाब का मुस्तहक होगा।
तीसरा शख्स जिसके लिये बददुआ की गई वह है कि जिसपर रमज़ान मुबारक गुज़र जाये और वह बख्शा ना जाये। यानि रमज़ान मुबारक जैसा खैर बरकत का महीना भी गफलत व मआसी में गुज़ारे और एबादत इलाही में और तौबा व अस्तगफार में मशगूल न हो हालांकि रमज़ान शरीफ में मगफिरत और रहमत की बकसरत बारिश होती है फिर भी उसकी बद आमालियों और कोताहियों की वजह से उसकी बख्शिश न हो। तो बताओ कि उसकी बख्शिश के लिये और कौन सा वक्त होगा। लिहाज़ा ऐसे शख्स की हलाकत में क्या ताअम्मुल है।
हिकायत : बुखारा शहर में एक मजूसी का लड़का रमज़ान में मुसलमानों के बाज़ार में खुले आम खाना खा रहा था। मजूसी बाप ने यह देखकर उसके मुंह पर तमांचा मारा और सख्त नाराज़ हुआ।
लड़का बोला अब्बा जान! तू भी तो रमज़ान मुबारक में हर रोज़ खाना खाता है बाप ने कहा वाकई मैं रोज़ा नहीं रखता और खाना खाता हूँ मगर खुफया तौर पर घर में बैठकर खाता हूँ और मुसलमानों के सामने नहीं खाता और उस महीना की बेहुरमती नहीं करता।
जब मजूसी मर गया तो बुखारा के किसी नेक शख्स ने उसको ख़्वाब में देखा कि वह बहिश्त में टहल रहा है। तो देखने वाले ने उससे पूछा कि तू तो मजूसी था बहिश्त में कैसे दाखिल हो गया?
उसने कहा वाकई मैं मजूसी था मगर जब मेरी मौत का वक्त करीब हुआ तो रमज़ान मुबारक के एहतेराम की बरकत से अल्लाह तआला ने मुझे इस्लाम क़ुबूल करने की तौफीक दी और मैं मरने से पहले इस्लाम क़ुबूल कर लिया। और मुसलमान होकर दुनिया से रुखसत हुआ। तो यह बहिश्त का दाखिला मुझे रमज़ान पाक के एहतेराम की बरकत से मिला है।
शबे कद्र की फज़ीलत : शबे कद्र जो सत्ताइसवीं रमज़ान शरीफ की रात है उसको बाकी रातों पर चन्द वजहों से बुज़ुर्गी हासिल है।
1इस रात में शाम से सुब्ह तक तजल्ली इलाही बन्दगान खुदा की तरफ मुतवज्जह होती रहती है।
2इस रात में मलाइका और अर्वाह आसमान से एबादत करने वालों की मुलाकात के लिये ज़मीन पर उतरते हैं और उनके आने और हाज़िर होने की वजह से एबादत में लज़्ज़त और कैफियत पैदा होती है। जो दूसरी रातों की एबादतों में पैदा नहीं होती।
3कुरआन मजीद इसी रात में नाज़िल हुआ।
4फरिश्तों की पैदाईश भी इसी रात में हुई।
5इसी रात बहिश्त में बागात लगाये गये।
6इसी रात में सैयदना हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का माद्दा जमा किया गया था।
शबे कद्र कौन सी रात है : शबे कद्र के मुतअल्लिक
बड़ा एखतेलाफ है कि वह कौन सी रात है। मगर मशहूर यह है कि रमज़ान शरीफ की सत्ताइसवीं रात है। इमाम शेरानी रहमतुल्लाह तआला अलैहि ने शबे कद्र की कुछ अलामतें बयान फरमाई हैं कि यह रात चमकदार और शफ्फाफ होगी। ना ज़्यादा गर्म और न ज़्यादा ठंडी मोतदिल होगी उस रात में न बादल होंगे न ही बारिश होगी। और न सितारे टूटेंगे जो शैतानों को मारे जाते हैं। और इसी रात की सुब्ह को सूरज बगैर शुआ के निकलेगा। और इसी रात में कुत्ते नहीं भौंकते।
शबे कद्र में दुआ क़ुबूल होती है।
शबे कद्र में एक ऐसी साअत है कि जिसमें जो दुआ मांगी जाये वह क़ुबूल होती है। लिहाज़ा मुसलमानों को चाहिये कि शबे कद्र में ऐसी जामे दुआ मांगे जो दोनों जहानों में फायदा बख्श हो। मसलन अपने गुनाहों की बख्शिश और रज़ाए इलाही के हुसूल की दुआ मांगी जाये। उम्मुल मोमिनीन सैयदा हज़रत आइशा सिद्दीका रज़ी अल्लाह तआला अन्हा फरमाती हैं कि
मैंने अर्ज़ की कि या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम आप बतायें कि अगर मुझे लैलतुल कद्र (शबे कद्र) का पता चल जाये तो मैं कौन सी दुआ मांगूं। आपने इरशाद फरमाया कि तू यह दुआ मांग। ऐ अल्लाह! बेशक तू माफ करने वाला और माफी मांगने वाले को दोस्त रखता है मुझे भी माफ कर दे।
मतलब यह कि इस रात अपने परवरदिगार से माफी की दरख्वास्त करता रहे और यह कहता रहे कि अल्ला हुम्मा इन्नक अफूउन तोहिब्बुल अफ्व फअफो अन्नी।
शबे कद्र की एबादत और नवाफिल : शबे कद्र में सैयदना हज़रत जिबरील अलैहिस्सलातो वस्सलाम दीगर फरिश्तों के साथ ज़मीन पर उतरते हैं। और चार झंडे गाड़ते हैं। एक रौज़ये अतहर पर एक काबा मुअज़्ज़मा की छत पर उसके फरिश्ते तमाम तरफों में फैल जाते हैं। और कोई ऐसा घर बाकी नहीं रहता जहां वह दाखिल ना हों। जो शख्स एबादत में मशगूल होता है फरिश्ते उसको सलाम देते हैं और यह नक्शा तुलू फज्र तक बाकी रहता है। (नुज़हतुल मजालिस भाग-1)
उस रात की एबादत हज़ार महीनों की एबादत से अफज़ल है अल्लाह करीम का इरशाद है इन्ना अन्ज़लना इस रात में नवाफिल पढ़ना, कुरआन की तिलावत करना। और तस्बीह व तहलील और असतग़फार पढ़ना चाहिये। शबे कद्र में जितने नफिल पढ़े जा सकें बड़ी सआदत है मगर जो किताबों में लिखे गये हैं वह यह हैं।
1चार रिकअत नफिल पढ़े हर रिकअत में अलहमदु लिल्लाह शरीफ के बाद सूरह तकासुर यानि अलहाकोमुत तकासूर एक मरतबा कुलहो तीन दफा पढ़े तो मौत की सख्तियों से आसानी होगी। और अज़ाबे कब्र से महफूज़ रहेगा।
2दो रिकअत नफिल पढ़े कि हर रिकअत में अलहमदु शरीफ के बाद कुलहो सात मरतबा पढ़े सलाम के बाद सात बार अस्तग़फिरुल्लाह पढ़े तो अपनी जगह से नहीं उठेगा कि उसपर और उसके वालदैन पर रहमत खुदा बरसनी शुरू हो जायेगी।
3चार रिकअत नफिल इस तरह पढ़े कि हर रिकअत में अलहमद के बाद इन्ना अन्ज़लनाहो एक बार और कुलहो सत्ताइस बार पढ़े तो यह शख्स गुनाहों से ऐसा पाक हो जाता है कि गोया आज ही अपनी माँ के पेट से पैदा हुआ है। और उसको अल्लाह करीम जन्नत में हज़ार महल एनायत फरमायेगा।
4दो रिकअत नफिल पढ़े कि हर रिकअत में अलहमद के बाद इन्ना अन्ज़लना एक बार और कुलहो तीन बार पढ़े तो अल्लाह तआला उसका शबे कद्र का सवाब अता फरमायेगा और उसके नफिल क़ुबूल फरमायेगा और उसको सैयदना हज़रत इदरीस और सैयदना हज़रत शोएब और सैयदना हज़रत अय्यूब और सैयदना हज़रत दाऊद और सैयदना हज़रत नूह अला नबीयना व अलैहिमुस्सलातो वस्सलाम का सवाब अता फरमायेगा। और उसको जन्नत में मशरिक से मगरिब तक एक शहर एनायत फरमायेगा।
5चार रिकअत नफिल इस तरह पढ़े कि हर रिकअत में अलहमद के बाद तीन मरतबा और कुलहो पचास मरतबा पढ़े फिर उस नमाज़ के बाद सजदा में जाकर एक दफा सुब्हानल्लाहि वल हमदुलिल्लाहि वलाइलाह इल्लल्लाहो वल्लाहो अकबर पढ़े फिर उसके बाद जो दुआ मांगे क़ुबूल होगी। और उसे अल्लाह तआला बेशुमार नेमतें अता फरमायेगा और उसके सब गुनाह बख्श देगा।