आठवां महीना — शाबानुल मुअज़्ज़म
शाबान के माना मुतफर्रिक होने के हैं अहले अरब माहे रजब गुज़ार कर जब इस महीना में कदम रखते थे तो काफिलों को लूटने और जदाल व कताल की तैयारी के सिलसिला में जुदागाना तौर पर चश्मों पर जाकर पड़ाव डालते थे उसी मुनासबत से इस महीने का नाम शाबान रखा गया।
हदीस शरीफ में है कि शाबान को इस लिये शाबान कहा जाता है कि इसमें रोज़ादार के लिये खैर कसीर तक़सीम होती है। यहाँ तक कि वह जन्नत में दाखिल होता है शाबान मुअज़्ज़म में मुन्दर्जा ज़ैल मशहूर वाकयात हुये। इसी महीना की पाँच तारीख को सैयदना हज़रत इमाम हुसैन रज़ी अल्लाहो अन्हो की विलादत मुबारक हुई।
इसी महीना की पंद्रहवीं तारीख को शबेबरात यानि लैलतुलकदर मुबारक है जिसमें उम्मत मुस्लिमा के बहुत अफराद की मगफिरत होती है।
इसी माह की सोलहवीं तारीख को तहवील किब्ला का हुक्म हुआ पहले इब्तेदा इस्लाम में कुछ अर्सा बैतुल मुकद्दस किब्ला रहा। और फिर अल्लाह तआला ने हुज़ूर सरापा नूर शाफये यौमुन्नुशूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की मरज़ी के मुताबिक काबा मुअज़्ज़मा को मुसलमानों का किब्ला बना दिया उस वक्त से हमेशा तक मुसलमान काबा शरीफ की तरफ मुंह करके नमाज़ अदा करते हैं।
सैयदना इमाम हुसैन रज़ी अल्लाहो अन्हो की विलादत मुबारक
सैयदुल अम्बीयाये वलमुरसलीन सलातुल्लाह अलैहि व सलामा की चची हज़रत उम्मुल फज़्ल बिन्ते हारिस सैयदना हज़रत अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब रज़ी अल्लाहो तआला अन्हो की जौजा एक दिन दरबार रिसालत में हाज़िर हुयीं और अर्ज़ की हुज़ूर! आज मैंने एक परेशान ख़्वाब देखा है।
रहमतुल आलमीन शफीउल मुज़नबीन सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने दरयाफ्त फरमाया तो अर्ज़ की हुज़ूर! मैंने ख़्वाब में देखा कि सरकार के जिस्म अतहर का एक टुकड़ा काटा गया और गोद में रखा गया।
आपने फरमाया तुमने निहायत ही अच्छा ख़्वाब देखा है इन्शाअल्लाह अलअज़ीज़ मेरी जगह फातमा ज़ोहरा (रज़ी अल्लाह तआला अन्हा) के हां एक बेटा पैदा होगा और वह तुम्हारी गोद में रखा जायेगा।
महबूब रब्बुल आलमीन सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की फरमाई हुई ताबीर पूरी हुई और सैयदुश्शुहदाए शहज़ादए कौनैन सैयदना हज़रत इमाम हुसैन रज़ी अल्लाह तआला अन्हो 5 शाबानुल मुअज़्ज़म 4 हिजरी में सैयदना हज़रत अली करमल्लाहो वज्हुल करीम के घर सैयदना आलम खातून जन्नत फातमा ज़ोहरा रज़ी अल्लाहो अन्हा के शिकम अतहर से पैदा हुये और हज़रत उम्मुल फज़्ल रज़ी अल्लाहो अन्हा की गोद में दिये गये। जैसा कि आका सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया था।
शाहे कौनो मकान सरदार दो जहां सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम बनफ्स नफीस शहज़ादीए कौनैन रज़ी अल्लाह तआला अन्हा के घर तशरीफ ले गये और अपने नूरे नज़र सैयदना हज़रत इमाम हुसैन रज़ी अल्लाह तआला अन्हो के कान में अज़ान दी और मुंह में अपना लोआब मुबारक डाला और दुआए बरकत फरमाई और सातवीं रोज़ अकीका किया और हुक्म फरमाया कि सर के बाल मुंडवाए जायें और बालों की मिक़दार चांदी सदका की जाये। ( )
इमामुल अम्बीया सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का नाम हुसैन शब्बीर रखा और आपकी कुन्नीयत अबु अब्दुल्लाह। और लकब सिब्ते रसूल और रिहानियतुल रसूल और रशीद और तीब ज़की वफी सैयद मुबारक है आखिर कार मुसलमान उन्हें सय्यदुश्शोहदा के नाम से पुकारते हैं और क़यामत तक आप इसी नाम से याद किये जायेंगे।
शाबानुल मोअज्जम की फजीलत : शाबानुल मोअज्जम का महीना एक बाबरकत महीना है जिसकी फजीलत में कुतुब अहादीस लबरेज़ हैं। चन्द अहादीस मुबारका लिखी जाती हैं।
रसूल खुदा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि शाबान रजब और माहे रमज़ान के दरमियान एक महीना है लोग उसकी शान से गाफिल हैं इसमें बन्दों के आमाल उठाये जाते हैं और मुझे यह महबूब है कि मेरे आमाल इस हाल में उठें कि मैं रोज़ादार हूँ।
शाबान मेरा महीना और रमज़ान अल्लाह तआला का महीना है। हज़रत उम्मुल मोमिनीन सैयदा आयेशा रज़ी अल्लाहो अन्हा फरमाती हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को तमाम महीनों से ज़्यादा प्यारा शाबान था।
शबे बरात की फज़ीलत : सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को तमाम महीनों से ज़्यादा प्यारा महीना शाबान था।
शबे बरात की फज़ीलत : माहे शाबान का तमाम महीना बरकतों और सआदतों का मजमुआ है खुसूसन उसकी पंद्रहवीं रात जिसको शबे बरात और लैलह मुबारक कहते हैं बाकी शाबान की रातों बल्कि तमाम साल की अकसर रातों से अफज़ल है। खुद खालिक दो जहां उस रात की तारीफ अपने कुरआन मजीद में इस तरह फरमाता है।
कसम है उस रौशन किताब की हमने उसे बरकत वाली रात में उतारा बेशक हम डर सुनाने वाले हैं उसमें बांट दिया जाता है हर हिकमत वाला काम हमारे पास के हुक्म से बेशक हम भेजने वाले हैं तुम्हारे रब की: तरफ से रहमत बेशक यही सुनता जानता है।
खुलासा मतलब यह है कि लैलतुल मुबारक से मुराद शबेबरात है और यही तफसीर मुफस्सेरीन का मज़हब है और उसकी मुबारक रात में हर शख्स का रिज़्क़ लिख दिया जाता है कि उस साल इस कदर उसको मिलेगा। और इतना इस्तेमाल कर लेगा।
इसी तरह अजल भी लिख दी जाती है कि फलां शख्स इतनी मुद्दत तक ज़िन्दा रहेगा और फलां वक्त में मरेगा। इसी तरह जो काम आइन्दा साल होने वाला होता है सब 'कुछ लिख दिया जाता है गर्जकि इस रात में नई फहरिस्त तैयार होती है। और बारगाहे इलाही में पेश की जाती है।
हदीस शरीफ में है कि शाबान की पंद्रहवीं रांत में खुदाये ज़ुलजलाल उस अस्माये दुनिया पर नुज़ूल जाह जलाल फरमाता है यानि उसकी रहमत नाज़िल होती है और कारकुनान गैबी अल्लाह तआला के सामने साल भर के आमाल नामे पेश करते हैं उसके बाद अहकमुल हाकिमीन अपनी शफकत से बन्दों को प्यारे खिताब से फरमाता है।
खबरदार, है कोई मगफिरत मांगने वाला कि मैं उसके गुनाहों को बख्श दूँ है कोई रिज़्क मांगने वाला कि मैं इसको रिज़्क दूँ है कोई कोई किसी मुसीबत में गिरफ्तार कि मैं उसको माफी अता करूँ। है कोई ऐसा यहां तक कि फज्र तक तुलू हो जाती है।
वह लोग कितने सआदतमन्द हैं जो इस रात को एबादत करते हैं और तौबा करके अपने रब को राज़ी करते हैं और अपने गुनाहों का बोझ हल्का करते हैं और रिज़्क हलाल मांग कर खज़ानए गैब से माला माल हो जाते हैं बीमारियों और मुसीबतों से पनाह मांग कर उनसे खलासी हासिल करते हैं उस रात अल्लाह तबारक व तआला से मुसलमानों के लिये आम माफी का एलान होता है और सबकी मगफिरत हो जाती है सिवाए चन्द लोगों के।
सैयदना अबु मूसा अशअरी रज़ी अल्लाह तआला अन्हो से मर्वी है कि हुज़ूर रहमतुल आलमीन सल्लल्लाहो अलैहि 'वसल्लम ने फरमाया बेशक अल्लाह तबारक व तआला शाबान की पंद्रहवीं रात में रहमत की तजल्ली फरमाता है। पस तमाम मखलूक की सिवाए मुशरिक और कीनावर (कीना रखने वाला) के।
बाज रिवायतों में है कि मुशरिक, जादूगर, काहिन, ज़िना पर इसरार करने वाला, हमेशा शराब पीने वाला, उनकी बख्शिश नहीं होती उससे मालूम हुआ कि जो मुसलमान किसी दूसरे मुसलमान से गैर शरअई तौर पर कीना और अदावत रखता है उसकी मगफिरत नहीं होती इस लिये पहले ज़माना के लोग शबेबरात से पहले ही एक दूसरे से माफी मांगते और उनको राज़ी करते थे ताकि उस रात की रहमत व मगफिरत से बहरावर हो सकें।
उम्मुल मोमिनीन हज़रत आइशा सिद्दीका रज़ी अल्लाह अन्हा फरमाती हैं कि एक रात महबूब किबरिया सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम मेरे पास से अचानक चले गये जब मुझे मालूम हुआ तो मैं आपकी तलाश में निकली अचानक मैंने आपको जन्नत अलबकी में मौजूद पाया। उस वक्त आपका सर मुबारक आसमान की तरफ था। जब आपने मुझे देखा तो फरमाया आइशा! (रज़ी अल्लाहो तआला अन्हा) क्या तुझे यह खौफ हो गया था कि खुदा और उसका रसूल तुझ पर ज़ुल्म करेगा।
तो मैंने अर्ज़ की कि मैंने यह खयाल किया था कि शायद आप किसी अपनी दूसरी के पास तशरीफ ले गये हैं।
आपने फरमाया कि अल्लाह तआला पंद्रहवीं शाबान की रात में लोगों की तौबा क़ुबूल करता है और उस रात में इस कदर लोगों के गुनाह माफ फरमाता है कि उनकी तादाद बनी कल्ब के क़बीला की बकरियों से ज़्यादा होती है।
शबेबरात एबादतों की रात है यह मुबारक रात सिर्फ एवादत की रात है इसमें हमातन कुरआनख्वानी और नवाफिल में मशगूल रहना चाहिये जितनी हिम्मत हो सके बढ़ चढ़कर एबादत करनी चाहिये सैयदना हज़रत अली मुरतज़ा शेरे खुदा रज़ी अल्लाह तआला अन्हो रावी हैं कि रहमतुल आलमीन सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया जब शाबान की पंद्रहवीं रात हो तो उस रात में कयाम करो और उसके दिन में रोज़ा रखो।
हिकायत :- किसी शख्स ने सैयदना हज़रत मालिक बिन दीनार रहमतुल्लाह अलैहि से तौबा का सबब दरयाफ्त किया तो उन्होंने फरमाया कि मैं शराब पीने का आदी था। और मेरी छोटी सी बच्ची थी जो मेरे सामने ही शराब की बोतलों को उंडेल देती थी जब वह दो साल की हुई तो वफात पा गई जिसकी वजह से मेरे दिल पर बड़ा सदमा हुआ।
जब शाबान की पंद्रहवीं रात आई तो मैंने ख़्वाब में देखा कि क़यामत क़ायम हो गई। और एक बड़ा अज़दहा (सांप) अपना मुंह खोले हुये मेरे पीछे लग गया। मैंने भागना शुरू कर दिया मुझे एक नेक बुज़ुर्ग नज़र आये मैंने उनसे कहा कि मुझे उस सांप से बचाओ तो उसने कहा खुदा तुम्हें बचाये।
तो उसने रोकर कहा कि मैं जईफ व कमज़ोर हूँ तुम्हें नहीं बचा सकता। लेकिन तुम आगे जाओ शायद अल्लाह नजात का कोई ज़रिया बना दे।
मैं भागा और एक आग के पास गया तो आवाज़ आई वापस जाओ।
मैं पीछे वापस हुआ मगर सांप मेरे पीछे लगा हुआ था। मैं फिर उस बुज़ुर्ग के पास से गुज़रा और उससे पनाह मांगी। उसने कहा कि मैं कमज़ोर हूँ तेरी मदद नहीं कर सकता अलबत्ता तू उस पहाड़ की तरफ चला जा इसमें मुसलमानों की अमानतें हैं। अगर तेरी भी कोई अमानत हुई तो वह तेरी मदद करेगा।
जब मैं पहाड़ के क़रीब पहुंचा तो एक फरिश्ता ने आवाज़ दी कि दरवाज़ा खोल दो शायद उसकी तुम्हारे पास कोई अमानत हो तो वह उसको दुश्मन से पनाह देगी। जब दरवाज़ा खुल गया तो अचानक मुझे मेरी बच्ची नज़र आई जिसने अपने दायें हाथ में मुझे पकड़ा और बायें हाथ से अज़दहा को दफा किया। वह सांप भाग गया फिर बच्ची ने कहा अब्बा जान! यानि क्या अभी तक वह वक्त नहीं आया कि तू तौबा करे।
मैंने उससे पूछा कि क्या तू कुरआन शरीफ जानती है? उसने कहा कि हाँ! मैंने उससे सांप के मुतअल्लिक पूछा तो बच्ची ने कहा कि वह तेरा अमल बद था वह बुज़ुर्ग तेरा नेक अमल था। मालिक बिन दीनार रहमतुल्लाह अलैहि फरमाते हैं कि मैं घबराते हुये बेदार हुआ तो मैंने मुकम्मल तौर पर तौबा की।