सातवां महीना — रजबुल मुरज्जब
इस्लामी सातवीं महीना का नाम रजबुल मुरज्जब है। रजब के लफ्ज़ी माना डरना एहतराम करना बचना और दरमियान के हैं यह महीना अशहर हरम में दाखिल होने की वजह से लायक एहतराम था। इस एहतराम के पेश नज़र लोग उस महीना में गुनाह करने से डरते और जंग व जदाल से बचते थे और अज़ रूये हिसाब यह साल का दरमियानी महीना भी था उन्हीं तमाम मुनासबतों की वजह से इस महीना को रजब से मौसूम किया गया।
इस महीना की यकम तारीख को सैयदना हज़रत नूह अला नबीयेना अलैहिस्सलाम कश्ती पर सवार हुये और इसी माह की चौथी तारीख को जंग सुफैन का वाकया पेश आया। और इस माह की सत्ताइसवीं की रात को महबूब किब्रिया सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने मेराज शरीफ की है जिसमें आसमानी सैर व जन्नत व दोज़ख का मुलाहज़ा और दीदार इलाही से मुशर्रफ होना था।
और इसी माह की अट्ठाइसवीं तारीख को अलकौनैन हज़रत अहमद मुजतबा मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को मबऊस फरमाया गया। इस महीना को असब भी कहा जाता है क्योंकि इसमें अल्लाह तआला अपने बन्दों पर रहमत व मगफिरत उंडेलता है। इसमें एबादतें कुबूल और दुआयें मुस्तजाब होती हैं। ज़मानए जाहिलियत में जब मज़लूम ज़ालिम के लिये बददुआ करना चाहता तो रजब के माह में बददुआ करता जो मकबूल बारगाहे इलाही होती। अलगर्ज बहुत सी हदीसें उसकी अज़मतो शान पर दलालत करती हैं
माहे रजबुल मुरज्जब में बाज जगहों पर सूरह मुल्क चालिस मरतबा पढ़कर रोटियों या छोहारों पर दम करते हैं और उनको तकसीम करते हैं और इस का सवाब मुर्दों को पहुंचाते हैं यह भी जायज़ व मुस्तहसन है और इसी माह रजब ही में हज़रत जलाल बुख़ारी अलैहिर्रहमा के कूंडे (कूंडे की फातिहा) होते हैं कि चावल या खीर पकवाकर कूंडों में भरते हैं और फातिहा दिलाकर लोगों को खिलाते हैं यह भी जायज़ है। हां एक बात गलत है कि जहां कूंडे भरे जाते हैं वहीं खिलाते हैं वहां से हटने नहीं देते उसे बहुत मायूब और गलत समझते हैं यह एक लग्व हरकत है और यह जाहिलों का तरीका।
कूंडे का फातिहा क्या सही क्या गलत
माहे रजबुल मुरज्जब में बाज जगह हज़रत सैयदना इमाम जाफर सादिक रज़ी अल्लाहो तआला अन्हो को ईसाले सवाब के लिये पूरियों की कूंडे भरी जाती हैं और फातिहा देकर खिलाते हैं यह भी जायज़ है, मगर उसमें भी इसी जगह खाने की बाज जगहों पर लोगों ने पाबन्दी कर रखी है कि जहां पका और फातिहा दिलाई वहीं बैठकर खाओ और पियो। हत्ताकि हाथ वहीं कहीं बर्तन में धुल लो इसकी पावन्दी है। इस कूंडे के मुतअल्लिक एक किताब भी है जिसका नाम दासताने अजीब है इस मौका पर बाज लोग इसको पढ़वाते हैं लेकिन मेरे दोस्तों इस किताब में जो कुछ भी लिखा हुआ है उसका 'कोई सुबूत नहीं। वह न पढ़ी जाये सिर्फ फातिहा दिलाकर ईसाले सवाब करें और कहीं भी ले जाकर खायें पियें इसमें कोई हर्ज नहीं। (बहारे शरीअत जि. 16 स.244)
रजब की फज़ीलत बाकी महीनों पर ऐसी जैसी मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की फज़ीलत बाकी अम्बीयाए किराम अलैहिस्सलातो वस्सलाम पर है और रमज़ान शरीफ की फज़ीलत बाकी महीनों पर ऐसी है जैसी अल्लाह तआला की फज़ीलत तमाम बन्दों पर है।
रजब शरीफ के रोज़े : रजबुल मुरज्जब के महीने में रोज़े रखना कारे सवाब है और बड़ा सवाब है सरदार अम्बीया सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया रजब एक अज़ीमुश्शान महीना है इसमें अल्लाह तआला नेकियों को दोगुना करता है। जो आदमी रजब के एक दिन का रोज़ा रखता है गोया उसने साल भर के रोज़े रखे और जो कोई रजब के सात दिन के रोज़े रखे तो उसपर दोज़ख के सात दरवाज़े बंद किये जायेंगे और जो कोई इसके आठ रोज़े रखे तो उसके लिये जन्नत के आठ दरवाज़े खोले जायेंगे। और जो आदमी रजब के दस रोज़े रखे तो अल्लाह करीम से जिस चीज़ का सवाल करे वह उसे देगा। और जो कोई रजब के पंद्रह दिन रोज़े रखे तो आसमान से एक मुनादी निदा करेगा कि तेरे गुज़िश्ता गुनाह माफ हो गये हैं और अब नये सिरे से अमल करना शुरू कर। और जो ज़्यादा रोज़े रखेगा, उसे अल्लाह करीम ज़्यादा देगा।
हिकायत : सैयदना हज़रत ईसा रूहुल्लाह अला नबीयेना व अलैहिस्सलातो वस्सलाम एक दफा एक पहाड़ के करीब से गुज़र रहे तो देखा कि पहाड़ से नूर की शुआयें निकल रही हैं तो आपने बारगाहे इलाही में अर्ज़ किया इलाही! पहाड़ को इजाज़त दे कि वह मेरे साथ कलाम करे।
आपका इतना अर्ज़ करना था कि पहाड़ ने अर्ज़ की ऐ रूहुल्लाह अलैहिस्सलाम, आप क्या चाहते हैं? तो आपने पूछा कि यह तेरी चमक कैसी है? पहाड़ ने अर्ज़ की मेरे अन्दर एक मर्दे खुदा है जिसकी बरकत से सारी चमक दमक नज़र आ रही है। फिर आपने बारगाह रब्बुल इज्ज़त में अर्ज़ की कि मौला! उस मर्दे खुदा को मेरे सामने हाज़िर फरमा।
तो पहाड़ फट गया और उससे एक हसीन जमील बुज़ुर्ग ज़ाहिर हुये उस बुज़ुर्ग ने कहा कि मैं सैयदना हज़रत मूसा अलैहिस्सलातो वस्सलाम की कौम से हूँ मैं अहमद मुजतबा मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का अहद मुबारक पा सकूँ ताकि मैं भी उनकी उम्मत में दाखिल हूँ। तो उस वक्त मैं छह सौ साल से मैं इस पहाड़ में मसरूफ एबादत हूँ।
सैयदना हज़रत ईसा ने अर्ज़ किया इलाही! क्या रूये ज़मीन पर तेरे नज़दीक उस शख्स से भी बढ़कर कोई बुज़ुर्ग है। तो अल्लाह जल्ल शानुहू ने फरमाया कि ऐ ईसा! (अलैहिस्सलाम) उम्मत मोहम्मदिया का जो फर्द रजब के महीना में एक दिन रोज़ा रखेगा तो मेरे नज़दीक उस शख्स से भी ज़्यादा बुज़ुर्ग होगा अलहम्दो लिल्लाह रब्बिल आलमीन।
हिकायत : रवायत है कि सैयदना हज़रत नूह अलैहिस्सलाम जब तूफान के दिनों में रजब के महीना में कश्ती पर सवार हुये तो आपने खुद भी रोज़ा रखा और अपने साथियों को भी रोज़ा रखने का हुक्म दिया तो उसकी बरकत से कश्ती छह माह चलती रही। और आशूरा के दिन जूदी पहाड़ पर रुकी और जब कश्ती से उतरे तो आपने और आपके साथियों ने रोज़ा रखा और अल्लाह करीम का शुक्रिया अदा किया।
हिकायत : बसरा में एक औरत बड़ी एबादतगुज़ार रहती थी जब उसकी मौत का वक्त करीब आया तो उसने अपनी औलाद को यह वसीयत फरमाई कि मुझे उन कपड़ों का कफन पहनाना जिनमें माहे रजबुलमुरज्जब में एबादत करती थी। मगर औलाद ने उसकी वसीयत पर अमल न किया। और उन कपड़ों के अलावा दूसरे कपड़ों का कफन दे दिया।
जब उसके कफन से फारिग हुये और घर आये तो क्या देखते हैं कि जिन कपड़ों में औरत का कफन दिया था वह तो मेरे घर में मौजूद है और उसके अपने कपड़े घर से गायब हैं। उससे उनको बड़ा ताअज्जुब हुआ।
इतने में हातिफ गैबी ने आवाज़ दी कि तुम अपने कपड़े ले लो हमने खुद उस औरत को उन कपड़ों का लिबास पहना दिया है जिसकी उसने वसीयत की थी। क्योंकि हम उस औरत को कब्र में गमज़दा नहीं देखना चाहते। इस लिये वह माहे रजबुलमुरज्जब में रोज़े रखती थी।