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MASLAK e ALA HAZRAT ZINDABAD
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جمادی الثانی (جمادی الآخر)

जमादिउस सानी (जमादिउल आख़िर)

Jamadi-us-Sani (Jamadi-ul-Akhir) · Mahina 6 / 12
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छठा महीना — जमादिउस सानी (जमादिउल आख़िर)

इस्लामी छठे महीने का नाम जमादिउस सानी (जमादिउल आख़िर) है। क्योंकि जब इस महीना का नाम रखा गया था उस वक्त मौसम का आखिर था। जिसमें पानी जमता था उसमें मुन्दर्जा ज़ैल वाकयात रूनुमा हुए।

1इस महीना की पहली तारीख को रसूले खुदा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम पर पहली मरतबा सैयदना हज़रत जिबरील अलैहिस्सलाम नाज़िल हुये थे।

2इसी माह की 22 तारीख सन् 13 हिजरी को हज़रत उमर बिन खत्ताब रज़ी अल्लाहो तआला अन्हो तख्त खिलाफत पर बैठे।

3इसी माह की नवीं तारीख को सैयदना हज़रत जाफर सादिक रज़ी अल्लाहो तआला अन्हो की विलादत पाक हुई।

4इसी महीना की चौदह 14 तारीख को मूसा इब्ने जाफर रज़ी अल्लाहो तआला अन्हो पैदा हुये।

5इसी महीना की पंद्रहवीं तारीख को सैयदना हज़रत इब्ने जुबैर रज़ी अल्लाहो तआला अन्हा ने काबा मुअज़्ज़मा को गिरा दिया था। इस हदीस शरीफ की वजह से जो उन्होंने सैयदा हज़रत आईशा सिद्दीका रज़ी अल्लाहो तआला अन्हा से सुनी थी और फिर उसे इसी हैय्यत पर लौटा दिया था जो हज़रत इब्राहीम अला नबीयना अलैहिस्सलातो वस्सलाम के ज़माना मुबारका में थी।

हज़रत खातून जन्नत की विलादत

सैयदा हज़रत फातमा ज़ोहरा रज़ी अल्लाहो अन्हा की विलादत मुबारका ज़हूर नबूवत से पांच साल पहले हुई थी। और महबूबे खुदा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की सबसे छोटी और प्यारी बेटी थीं। आपका नाम फातमा रखा गया। यह लफ्ज़ फुतूम से मुश्तक़ है जिसके मानी मुफारेकत अज़हर चीज़ है चूँकि अल्लाह तआला ने आपको और आपके मोहिब्बों को आतिश दोज़ख से दूर रखेगा। और आपके यह अलकाब हैं।

बतूल : जो तेल से माखूज है जिसके मानी कता के हैं चूँकि आपके ज़माने की औरतों से फज़ल और दीन व हुस्न में अलग थीं कोई भी बराबर की नहीं थी आप मासेवा अल्लाह से मुनकता थीं।

ज़ुहरा भी आपका लकब था। ज़ुहरा अज़हर बिलजम से माखूज है जिसका माना बयाज़ व हुस्न के हैं। आप भी हुस्न व कमाल रखती थीं। इस लिये ज़ुहरा का लकब आपको दिया गया।

जमादिउस सानी (जमादिउल आख़िर) की नफल

इसी महीना की पहली तारीख में चार रिकअत नफल पढ़े और हर रिकअत में कुलहुअल्लाहो अहद तेरह मरतबा पढ़े तो उस शख्स के लिये एक लाख नेकियां लिखी जाती हैं। और एक लाख बुराईयां मिटायी जाती हैं।

और दूसरी नमाज़ भी है जिसे सैयदना हज़रत अबु बकर सिद्दीक रज़ी अल्लाहो अन्हो पढ़ा करते थे आप उस महीना की पहली रात में बारह रिकअत अदा करते थे। इस नमाज़ के लिये कोई खास सूरत मुकर्रर नहीं है।