चौथा महीना — रबीउस सानी (रबीउल आख़िर)
इस्लामी चौथे महीना का नाम रबीउस सानी (रबीउल आख़िर) है इस महीना के मशहूर वाकेआत यह हैं। कि इस महीना की तीसरी तारीख को हज्जाज इब्ने यूसुफ ने काबा मुअज़्ज़मा पर आग फेंकी थी। जब कि सय्यदना हज़रत इब्ने जुबैर रज़ी अल्लाहो अन्हो वहां महसूर थे। जिससे खाना काबा जल गया था। और महीने की चौदहवीं तारीख को नमाज़ फर्ज़ हुई।
और इसी महीना मुबारक में सय्यदना व मौलाना अलकुतुब अलफर्द अलगौस शेखुल इस्लाम वलमुस्लिमीन गौस अस्सक़लैन अश्शेख मुहीयुद्दीन अबु मोहम्मद अब्दुल कादिर अलहसनी वलहुसैनी अलजिलानी अलहंबली अल मारूफ पिराने पीर दस्तगीर रज़ी अल्लाहो अन्हो व रज़ा अना का विसाल मुबारक हुआ।
मगर विसाल पाक की तारीख में ज़रा इख्तलाफ है। बाज ने. नवीं, बाज ने सतरहवीं। और बाज ने ग्यारवीं रबीउस सानी (रबीउल आख़िर) को विसाल शरीफ बताया है।
मोहक़्क़िक़ अललइतलाक शेख अब्दुल हक मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह तआला अलैहि लिखते हैं यानि हमारे मुल्क में आज कल (आप की विसाल ग्यारहवीं तारीख को मशहूर है और हमारे हिन्दुस्तान के मशाइख और उनकी औलाद के नज़दीक यही मोतआरफ व मशहूर है)
साल भर में इस तारीख को बुजुर्ग लोग सरकार गौसियत का उर्स मुबारक करते हैं जिसको बड़ी ग्यारहवीं कहा जाता है।
सय्यदना गौस आजम रज़ी अल्लाह के मुख्तसर हालात सिलसिला नस्ब व विलादत
कुतुबुल अक़ताब फर्दुलअहबाब उस्ताज शोयूख आलम इस्लाम वल मुस्लिमीन हज़रत मुहीयुद्दीन अबु मोहम्मद अब्दुल कादिर जिलानी वलहुसैनी रज़ी अल्लाहो तआला अन्हो नजीबुल तरफैन हैं। वालदा माजदा की तरफ से हुसैनी और वालिद माजिद की जानिब से हसनी थे। और यह शराफत बहुत ही कम नसीब लोगों को हासिल होती है। वालिद माजिद का नाम सय्यद अबु सालेह और वालदा माजदा का इस्मेगरामी उम्मुल खैर फातिमा बिन्ते अब्दुला सुमई उल हुसैनी था। रज़ी अल्लाहो तआला अन्हुमा
आप ईरान के मशहूर कस्बा जेल में यकुम रमज़ानुल मुबारक 740 हिजरी को पैदा हुये आपने नव्वे (90) साल की उम्र में बतारीख 11 रबीउस सानी (रबीउल आख़िर) 561 हिजरी मुताबिक 1182 इस्वी में दाई अजल को लब्बैक कहा। नमाज़े जनाज़ा में बेशुमार लोग हाज़िर हुये। कसरत हुजूम के बाइस रात के वक्त आप के मदरसा में सायबान के नीचे आप को जिस्म अक़दस सुपुर्द खाक किया गया। बगदाद शरीफ में आपका मज़ार मुबारक मरजाए खलायक है।
आप मादरज़ाद वली थे
यह बात निहायत मशहूर व मारूफ है कि सय्यदना हज़रत गौस आजम रज़ी अल्लाहो तआला अन्हो अय्याम रज़ाअत में माहे रमज़ानुल मुबारक में दिन के वक्त अपनी वालदा माजदा का दूध नहीं पीते थे। यह बात लोगों में फैल गई। कि फलां शरीफ घराने में एक ऐसा बच्चा पैदा हुआ है, जो रमज़ान शरीफ में दिन के वक्त मां का दूध नहीं पीता। और रोज़ा से रहता है, इस बात से साबित हुआ कि आप मादरज़ाद वली थे।
एक दफा लोगों ने आपसे पूछा कि आपको कैसे मालूम हुआ कि आप वली अल्लाह हैं? फरमाया मैं दस बरस का था कि घर से मदरसे से जाते वक्त देखा कि फरिश्ते मेरे साथ चल रहे हैं। फिर मदरसा में पहुंचने के बाद वह फरिश्ते दूसरे बच्चों से कहते कि "वली अल्लाह" के लिये जगह दो। फरमाते हैं कि एक दिन मुझे एक ऐसा शख्स नज़र आया जिसे मैंने कभी नहीं देखा था उसने एक फरिश्ता से पूछा कि यह कौन लड़का है? जिसकी इतनी इज्ज़त करते हो? उस फरिश्ते ने जवाब दिया कि यही वली अल्लाह हैं जो बहुत बड़े मरतबे का मालिक होगा। राहे तरीकत में यह वह शख्सियत है जिसे बगैर रोक टोक के नेमतें दी जा रही हैं। और बगैर किसी हिजाब के तमकीन व क़रार एनायत हो रहा है। और बगैर किसी हुज्जत के तकर्रुब इलल्लाह मिल रहा है। अलगर्ज चालिस साल की उम्र में मैंने पहचान लिया कि वह पूछने वाला शख्स अपने वक्त का अबदाल था।
हिकायत : एक दफा आपको जामा मस्जिद में छींक आई तो लोगों ने यरहमकल्लाह और यरहमुकल्लाह की आवाज़ें बुलंद कीं। खलीफा वक्त अलमुस्तनजिद बिल्लाह ने जो इत्तेफाकन मस्जिद के कमरा में थे। परेशान होकर पूछा कि यह शोरोगौगा कैसा? लोगों ने कहा कि हज़रत गौस आजम रज़ी अल्लाह अन्हो को छींक आई थी जिसपर लोगों ने उनको दुआ दी है।
आपका इल्म व फज़्ल
सय्यदना हज़रत गौस आजम रज़ी अल्लाह अन्हो इल्म ज़ाहरी और बातनी के एक मुतबहिर आलिम फाज़िल थे। एक दिन आपकी मजलिस में एक कारी ने कुरआन करीम की एक आयात तिलावत की आपने उसकी तफसीर बयान करनी शुरू की। पहले एक तफसीर फिर दूसरी और तीसरी यहां तक कि हाज़रीन के इल्म के मुताबिक उस एक आयत की ग्यारह तफसीरें बयान फरमायीं, फिर और यहां तक के चालिस वजह बयान कीं। और हर मआना व तफसीर की आलैहदा आलैहदा से सनद और दलील इस तरह दी कि हाज़रीन दम बखूद रह गये।
हिकायत :- तमाम उल्माये एराक बल्कि दुनिया के तमाम तलबगारान हाल व क़ाल के आप मरजी वसीला थे दुनिया के हर गोशा से आपके पास फतवे आते जिन पर फौरन बगैर मुताला कुतुब और गौर व फिक्र जवाब लिखते किसी बड़े-बड़े हाज़िक व फाज़िल आलिम को आप के जवाब के खिलाफ लिखने या कहने की ताकत ना थी।
एक मरतबा अजम से आपके पास फतवा आया। जिसमें लिखा था कि क्या फरमाते हैं सरदारान उलमा इस मसले में के एक आदमी ने यह कसम खाई कि मैं अल्लाह तआला की इस तरह एबादत करूं कि उस एबादत में कोई इन्सानी शरीक ना हो। वरना मेरी औरत पर तीन तलाकें हैं। अब फरमाइये कि यह शख्स कौन सी एबादत करे कि इसकी कसम न टूटे।
उस फतवा के लिखने में तमाम उल्माए एराक सरगश्ता व हैरान और आजिज़ हो गये। गर्जकि आपके सामने यह इस्तिफ्ता पेश हुआ। आपने गौर व फिक्र किये बगैर फौरन फरमाया कि उस शख्स के लिये खाना काबा में इस तरह जगह छोड़ी जाये कि यह तन्हा तवाफ करे और अपनी कसम से अहदा बरआवर हो सके यानि तवाफ काबा ही वह एबादत है जिसमें कोई आदमी शरीक कार नहीं होता जब कि वह शख्स तन्हा तवाफ कर रहा हो।
क्या शान है गौस आजम की चुटकियों में जवाब एनायत फरमाते हैं।
आपकी एबादत व रियाज़त
सय्यदना गौस आजम रज़ी अल्लाह तआला अन्हा का तरीका सुलूक बेइन्तेहा मशक्कत और बेनज़ीर था। आप के किसी हमअसर शेख में इतनी मजाल ना थी कि आप जैसी रियाज़त व मुजाहदा में आपकी हमसरी कर सके। आप का कायदा था कि अपने हर अज़ू को इसकी ताकत के मवाफिक सुपुर्द कर दिया करते और कूवत कल्ब के मवाफिक मज़ारी अक़दा में रूह व नफस का ज़ाहिरन व बातिनन ज़िक्र किया करते। गायब व हाज़िर दोनों हालतों में नफस की सिफात को अलायहदा करके नफा व नुकसान और दूर व नज़दीक का फर्क मिटा दिया करते। किताब व सुन्नत की पैरवी में मुताबकत ऐसी थी कि आप हर हालत में हर वक्त अल्लाह तआला का ज़िक्र करते। और हुज़ूर कल्ब के साथ तौहीद इलाही में मशगूल रहते।
एक मरतबा आपने फरमाया पच्चीस साल तक तर्क दुनिया किये हुये एराक के जंगलों और मैदानों में इस तरह फिरता रहा कि मैं किसी को ना पहचानता और न कोई मुझे जानता और रिजाल गैब और जिन्नात मेरे पास आमद व रफ्त रखते और मैं उनको हक की तालीम दिया करता। और चालिस साल तो मैंने फज्र की नमाज़ इशा के वज़ू से अदा की। और पंद्रह साल तक इशा की नमाज़ बाद एक कुरआन शरीफ खत्म करता रहा। एक पांव पर खड़े होकर एक हाथ से दिवार की कुण्डी पकड़कर एबादत में सुबह कर देता। तीन से चालिस दिन तक ऐसा बहुत सा सारा ज़माना गुज़रा है कि खाने पीने और सोने से आलाहदा रहा।
आप की शफकत मुरीदों पर
मशायख ऐजाम की एक जमाअत फरमाते हैं कि हुज़ूर गौस आजम रज़ी अल्लाहो अन्हो ने फरमाया कि क़यामत तक मैं अपने तमाम मुरीदों का ज़ामिन हूँ कि उनकी मौत तौबा पर वाके होगी। यानि बगैर तौबा न मरेंगे। चन्द मशायख ने हुजूर से पूछा कि अगर कोई शख्स आपके हाथ पर बैत न करे और ना ही आपके हाथ से खिरका पहना हो बल्कि सिर्फ आपका इरादतमन्द हो। और आपकी तरफ अपने को मन्सूब करता हो तो क्या ऐसे शख्स को आपके असहाब में शुमार किया जा सकता है? और या ऐसा शख्स उन फज़ीलतों में शरीक होगा जो आपके मुरीदों को हासिल होंगे।
हुज़ूर गौस आजम रज़ी अल्लाहो अन्हो ने फरमाया कि जिस शख्स ने आपको मेरी तरफ मनसूब किया और मुझसे इरादत व अकीदत रखी तो अल्लाह तआला उसको क़ुबूल करेगा। उसपर रहमतें नाज़िल करेगा और उसको तौबा की तौफीक देगा अगरचे उसके तरीक कार मकरूह हों। और ऐसे शख्स का शुमार मेरे मुरीदों और असहाब में है अल्लाह तआला अपने फज़्ल व करम के सदका वादा किया कि मेरे दोस्तों मेरे अहले मज़हब मेरे राह पर चलने वाले मेरे मुरीदों और मुझसे मोहब्बत करने वाले को जन्नत मरहमत फरमायेगा। उसके अलावा आपने फरमाया कि अल्लाह तआला ने मुझे दो रजिस्टर एनायत किया जिसमें मेरे तमाम उन दोस्तों और मुरीदों के नाम दर्ज हैं जो क़यामत तक मेरी इरादत में आते रहेंगे। यह रजिस्टर अल्लाह तआला ने एनायत करके फरमाया कि मैंने उन सबको तेरी वजह से बख्श दिया।
फरमाते हैं कि एक दिन दोज़ख के निगहबान जिसका नाम मालिक है मैंने पूछा क्या तेरे पास हमारा कोई दोस्त है। उसने जवाब दिया कि कसम खुदा की कोई नहीं।
फिर फरमाया मेरे मुरीदों पर मेरा हाथ ऐसा है जैसे ज़मीन पर आसमान, अगर मेरा कोई मुरीद बुज़ुर्ग नहीं तो क्या मुज़ायका है (कोई नुकसान नहीं) मैं तो सय्यद और बुज़ुर्ग मौजूद हों परवरदिगार के जलाल की कसम जब मेरे तमाम मुरीद जन्नत में दाखिल ना हो जायेंगे उस वक्त तक बारगाहे खुदावन्दी से कदम ना उठाऊंगा अगर मेरे किसी मुरीद की मशरिक में पर्दादरी की जा रही हो और मैं मग़रिब में हूँ तो तब भी मैं उस की पर्दापोशी करूँगा।
एक मरतबा आपने इरशाद फरमाया कि हुसैन इब्ने मन्सूर हल्लाज के ज़माना में कोई ऐसा था जो उसकी दस्तगीरी करता। अगर मैं उस ज़माना में होता तो लाज़मन उसकी दस्तगीरी करता और नौबत यहां तक ना पहुंचती। और मैं क़यामत तक अपने मुरीदों की दस्तगीरी करूँगा अगरचे वह मरकब से फिसलकर गिर पड़े। अल्लाह तआला से तुम जो कुछ मांगना चाहते हो मेरे वसीले से मांगो ताकि तुम्हारी मुराद पूरी हो सके।
आप फरमाते हैं जो किसी तकलीफ में मुझसे इमदाद चाहे या मुझे आवाज़ दे और पुकारे उसकी तकलीफ पूरी की जायेगी। और जो कोई दो रिकात नमाज़ इस तरह पढ़े कि हर नमाज़ में सूरह फातिहा के बाद ग्यारह मरतबा सूरह एखलास पढ़े और फिर सरवरे आलम सल्लल्लाहो तआला अलैहि व बारिक व सल्लम पर दरूद पढ़े इस तरह दोनों रिकातें खत्म करके सलाम फेरने के बाद दरूद शरीफ पढ़े, और एराक की जानिब ग्यारह कदम चले और मेरा नाम लेकर अपनी मुराद अल्लाह तआला से मांगे तो अल्लाह तआला उसकी मुराद अपने फज़्ल व करम से पूरी करेगा।
हिकायत : आपकी मजलिस वाज़ में चार सौ अश्खास कलम दवात लिये आपकी नसीहतें कलमबंद कर रहे थे। आपने फरमाया कि इब्तेदाई ज़माना में सरवर आलम सल्लल्लाहो तआला अलैहि व बारिक व सल्लम और सय्यदना हज़रत मौला अली मुरतज़ा करमल्लाहो तआला वज्हुल करीम को मैंने ख़्वाब में देखा जिन्होंने मुझे वाज़ करने का हुक्म दिया और मेरे मुंह में अपना लआब दहन टपकाया और मुझपर अबवाब सुखन खोल दिये।
हिकायत : एक दिन सय्यदना गौस आजम रज़ी अल्लाहो तआला अन्हो वाज़ फरमा रहे थे कि अचानक आप चन्द कदम हवा (फिज़ा) में ऊपर गये और फरमाया ऐ इसराईली ठहर जा और मोहम्मदी कलाम सुन। जब वापस अपनी जगह पर तशरीफ लाये तो लोगों ने पूछा कि यह मामला क्या था।
आपने फरमाया हज़रत अबुलआस खिज़िर अलैहिस्सलाम जा रहे थे और हमारी मजलिस वाज़ पर से तेज़ रफ्तारी के साथ गुज़र रहे थे इस लिये मैंने उनकी तरफ मुतवज्जह होकर फरमाया कि इतनी तेज़ रफ्तारी ना करो और वाज़ सुनते जाओ। अखबार अलअखयार सफा 19
आपका हुलिया शरीफ
नहीफुल बदन, मियाना कद, कुशादा सीना, लंबी चौड़ी दाढ़ी, गंदुमी रंग, अबरो पैवस्ता, बुलंदे आवाज़, इल्म कामिल और असर के ग़ालिब थे, आपके कलाम में इस किस्म की जल्दी थी कि जिससे सुनने वाले दिल में रोब व हैबत पैदा हो जाती आपकी आवाज़ में एक खूबी यह भी थी कि मजलिस में दूर व नज़दीक के सुनने वालों को आपकी गुफ्तगू बगैर किसी कमी व बेशी के पूरी की पूरी सुनाई देती थी। जिस तरह करीब का शख्स सुनता था वैसे ही मजलिस में दूर दूर बैठने वाला भी बआसानी आपकी बातें सुन लिया करता था। आपके कलाम करते वक्त हर शख्स पर सुकूनत व खामोशी का आलम तारी रहता। और आप के हुक्म की तामील में हर शख्स सुरअत व जल्दी दिखाता। और बड़े से बड़ा सख्त दिल जब आपको देखता तो खुशू व खुज़ू आजिज़ी व लाचारी के साथ आपका मुती व फरमाबरदार हो जाता। आप जब मस्जिद में तशरीफ लाते तो हाजतमन्द लोग आप से अपने लिये दुआ कराते उस वक्त आप सबके लिये दरबारे इलाही में दुआ मांगते।
ग्यारहवीं शरीफ की फातिहा
माहे रबीउस सानी (रबीउल आख़िर) की ग्यारहवीं तारीख बल्कि हर महीना की ग्यारहवीं तारीख को हज़रत सय्यदना गौस पाक रज़ी अल्लाहो अन्हो की फातिहा दिलाई जाती है यह भी ईसाले सवाब की एक सूरत है बल्कि गौस पाक रज़ी अल्लाह अन्हो की जब फातिहा होती है, किसी तारीख में हो अवाम उसे ग्यारहवीं की फातिहा बोलती है। माहे रजब की छठी तारीख को हुज़ूर ख्वाजा गरीब नवाज़ मोईनुद्दीन चिश्ती रज़ी अल्लाह अन्हो की फातिहा भी ईसाले सवाब में दाखिल है। असहाबे कहफ का तोशा या हुज़ूर गौस आजम रज़ी अल्लाहो अन्हो का तोशा या हज़रत शेख अहमद अब्दुलहक रुदौलवी का तोशा भी जायज़ है।