Update
Ahle Sunnat Wa Jamaat Ki Mustanad Islamic Website — Quran, Books, Fatawa & Audio Masail
MASLAK e ALA HAZRAT ZINDABAD

पहला महीना — मुहर्रमुल हराम

इस्लाम में पहला महीना मुहर्रमुल हराम है। और मुहर्रमुल हराम इस लिये कहा जाता है कि इस माह में जंग व कताल हराम है, यह अल्लाह तआला का महीना है और इस महीने में आशूरा का दिन बहुत मोअज्ज़म है, यानि दसवीं मुहर्रम का दिन। इस में मुन्दर्जा जैल बड़े-बड़े वाकेआत पेश आये।

1इसी दिन फिरऔन और उसका लश्कर गर्क़ हुआ।

2इसी दिन सैयदना हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तौबा क़ुबूल हुई।

3इसी दिन हज़रत सैयदना हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम की क़ौम की तौबा क़ुबूल हुई।

4इसी दिन हज़रत सैयदना हज़रत नूह अलैहिस्सलाम कश्ती से सलामती के साथ उतरे और शुक्रिया के तौर पर रोज़ा रखा, और दूसरों को रोज़ा का हुक्म दिया।

5इसी दिन बनी इसराईल के लिये अल्लाह तआला ने दरया को फाड़ा।

6इसी दिन सैयदना हज़रत इब्राहीम ख़लील उल्लाह अलैहिस्सलाम पैदा हुये।

7इसी दिन सैयदना हज़रत ईसा अलैहिस्सलातो वस्सलाम पैदा हुये।

8इसी दिन सैयदना यूसुफ अलैहिस्सलाम क़ैद से निकले।

9इसी दिन सैयदना हज़रत यूनुस अलैहिस्सलाम मछली के पेट से निकले।

10इसी दिन सैयदना हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पैदा हुये।

12इसी दिन सैयदना हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम ने मर्ज़ से शिफा पाई।

13इसी दिन सैयदना हज़रत याकूब अलैहिस्सलाम की बिनाई वापस आई।

14इसी दिन सैयदना हज़रत यूसुफ अलैहिस्सलाम कुएं से वापस निकले।

15इसी दिन सैयदना हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम को बादशाही मिली।

16इसी दिन सैयदना हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम जादूगरों पर ग़ालिब आये।

17इसी दिन सैयदना हज़रत इमाम हुसैन रज़ी अल्लाह अन्हों ने मरतबा शहादत हासिल किया।

18इसी दिन क़यामत क़ायम होगी।

19इसी दिन रब्बुल आलमीन ने अर्श पर अपनी शान के मुनासिब इसतेवार फरमाया।

20इसी दिन पहली बारीश आसमानों से नाज़िल हुई।

21इसी दिन पहली रहमत नाज़िल हुई।

22इसी दिन अल्लाह तआला ने कुरसी को पैदा किया।

23इसी दिन अल्लाह तआला ने कलम को पैदा किया।

24इसी दिन अल्लाह ने आसमान को पैदा किया।

25इसी दिन सैयदना हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम को जन्नत की तरफ उठाया गया।

26इसी दिन अल्लाह ने पहाड़ों को पैदा किया।

27इसी दिन अल्लाह ने समुद्र को पैदा फरमाया।

28आशूरा के दिन असहाबे कहफ करवटें बदलते हैं। आशूरा के दिन ज़मज़म शरीफ दुनिया के तमाम पानी में मिल जाता है इस लिये इस रोज बिल्खुसूस (गुस्ल) नहाने का एहतेमाम करें।

29आशूरा के रोज़ गुस्ल करना मर्ज़ व बीमारी से बचाव का सबब है। रहमतुल आलमीन सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं। जो शख़्स आशूरा के रोज़ गुस्ल कर ले तो किसी मर्ज़ में मुब्तेला ना होगा सिवाए मर्ज़े मौत के।

30आशूरा के रोज़ गुनाहों और मआसी से तौबा करनी चाहिये अल्लाह तआला उसकी तौबा क़ुबूल फरमाता है, सय्यदना हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर वही नाज़िल हुई और हुक्म हुआ। अपनी क़ौम को हुक्म दो कि वह दसवीं मुहर्रम को मेरी बारगाह में तौबा करें और जब दसवीं मुहर्रम का दिन हो तो मेरी तरफ निकलें यानि तौबा करें। मैं उनकी मग़फिरत फरमाऊंगा।

31आशूरा के दिन आंखों में सुरमा डालना, आंखों की बिमारियों के लिये शिफा है सय्यदे आलम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम फरमाते हैं।

जो शख्स आशूरा के दिन रोज़े असमद का सुरमा आंखों में लगाये तो उसकी आंखें कभी भी ना दुखेगी।

हज़रत मुल्ला अली क़ारी रहमतुल बारी अपनी किताब मौजूआत अलकबीर में फरमाते हैं कि आशूरा के रोज़ आंखों में सुरमा लगाना खुशी के इज़हार के लिये नहीं होना चाहिये क्योंकि यह ख़ारजी लोगों का फेल है कि वह इस में खुशी का इज़हार करते हैं। बल्कि हदीस शरीफ पर अमल के लिये हैं सुरमा डालना चाहिये (अल्मुजुआत अलकबीर)

32आशूरा के दिन अपने अहलो-अयाल के वास्ते घर में बड़े पैमाने पर खाने का इन्तेज़ाम करना चाहिये। ताकि अल्लाह तआला उस घर में सारा साल वसअत फरमाये।

सैयदना हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद रज़ी अल्लाह तआला अन्ह से रवायत है कि रसूल खुदा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो कोई आशूरा के दिन अपने अहलो व अयाल पर नफका में वसअत करेगा तो अल्लाह तआला उस पर सारा साल वुसअत बढ़ोतरी फरमायेगा।

हज़रत सुफियान सूरी ने फरमाया कि हमने उसका तजुरबा किया तो ऐसा ही पाया। (मिश्कात शरीफ 170)

हज़रत महबूब सुबहानी कुतुब रब्बानी सैयदना शेख अब्दुल क़ादिर जिलानी रहमतुल्लाह अलै अपनी किताब गुनीयतुत तालिबीन जिल्द दोम सफह 54 में लिखते है कि हज़रत सुफियान सूरी रहमतुल्लाह अलैहि ने फरमाया कि हमने पचास साल इसका तजुरबा किया तो बढ़ोतरी ही देखी।

इसी तरह अल्लामा मुनावी फैज़ुलक़दीर जिल्द 6 सफहा 236 में लिखते है कि सैयदना हज़रत जाबिर सहाबी रज़ी अल्लाह अन्हों ने फरमाया कि हमने इसका तजुरबा किया तो इसको सही पाया और सैयदना इब्ने औनी रज़ी अल्लाह तआला अन्हों ने फरमाया कि हम ने पचास या साठ साल इसका तजुरबा किया तो वसअत ही पाई। लेहाजा मुसलमानों को चाहिये कि इस दसवीं मुहर्रम को बड़े पैमाने पर खाना पकाना चाहिये।

फजायल यौम आशूरा (यानि दसवीं मुहर्रम)

अल्लाह तबारक व तआला इरशाद फरमाता है।

अल्लाह तबारक व तआला अपनी सबसे अच्छी और सही किताब कुरआन पाक में इरशाद फरमाता है कि बारह महीनों से यह चार इज़्ज़त वाले महीने जो अल्लाह तबारक व तआला के यहां क़ाबिले एहतेराम हैं, मुहर्रम के महीने में यानि दस मुहर्रम जिस दिन इताअत ख़ुदा वंदी बजा लाने वालों को अल्लाह तआला ने बहुत बड़ा मक़ाम अता फरमाया।

हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ी अल्लाह अन्हुमा फरमाते है कि नबी अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया जो शख्स मुहर्रम में किसी दिन रोज़ा रखेगा उसे हर दिन के बदले तीस का सवाब मिलता है।

हज़रत मैमून इब्ने महरान हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ी अल्लाह अन्हुमा से रवायत करते हैं कि नबी अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया जिसने भी मुहर्रम में आशूरा का रोज़ा रखा उसे दस हज़ार फरिश्तों दस हज़ार शहीदों और दस हज़ार हाजियों और उमरा करने वालों के बराबर सवाब मिलता है, जिसने दस मुहर्रम को किसी यतीम बच्चे के सर पर हाथ फेरा तो अल्लाह तआला उस बच्चे के सर पर बालों के बराबर इसके दरजात बुलंद फरमाता है और हां आगे फरमाते हैं कि जो शख्स आशूरा की रात किसी मोमिन को रोज़ा इफ्तार कराये तो गोया उसने पूरी उम्मते-मोहम्मदिया को रोज़ा इफ्तार कराया और यही नही बल्कि यूं समझये कि उन सब को पेटभर खाना खिलाया।

सहाबे केराम ने अर्ज़ किया या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम क्या अल्लाह तबारक व तआला ने यौमे आशूरा को तमाम दिनों पर फज़ीलत अता फरमायी, तब आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया, हां अल्लाह तआला ने आसमान को आशूरा के दिन पैदा फरमाया, पहाड़ों को आशूरा के दिन पैदा फरमाया, दरियाओं को आशूरा के दिन पैदा फरमाया, कलम को आशूरा के दिन पैदा फरमाया, लौह को आशूरा के दिन पैदा फरमाया, हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को आशूरा के दिन पैदा फरमाया, और आशूरा के दिन आप को जन्नत में दाखिल किया गया, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को आशूरा के दिन पैदा फरमाया, उन्हें आग से आशूरा के दिन नेजात अता फरमाई, उनके लख़्ते जिगर के जब्ह का बदला आशूरा के दिन दिया (मोतबर व मशहूर रवायात के मुताबिक हज़रत इसमाईल के जब्ह का बदला दस ज़िलहिज्जा को दिया गया) फिरऔन को आशूरा के दिन ग़र्क़ किया, हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की आज़माइश आशूरा के दिन ख़त्म की गयीं, हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की तौबा आशूरा के दिन क़ुबूल फरमायी। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को आशूरा के दिन पैदा फरमाया, और क़यामत भी आशूरा के दिन ही क़ायम होगी। फिर आगे एक दूसरी रवायत में फरमाते हैं कि हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ी अल्लाह अन्हुमा कि नबी अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जो शख्स आशूरा के रोज़ रोज़ा रखे अल्लाह तआला उसको साठ साल रोज़ा रखने और क़याम करने का सवाब लिख देता है फिर आगे फरमाते हैं कि जो शख्स आशूरा के दिन रोज़ा रखे उसके लिये अल्लाह तआला सात आसमानों में बसने (रहने) वालों का सवाब लिखता है।

हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम को आशूरा के दिन आसमान पर उठाया, हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की लग़ज़िश आशूरा के दिन दूर फरमाई हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम को बादशाहियत आशूरा के दिन मिली, आसमान से पहली बारिशे रहमत आशूरा के दिन सबसे पहले बारिश आशूरा के दिन उतरी, जो आदमी आशूरा के दिन गुस्ल करे वह मौत के अलावा किसी मर्ज़ में मुब्तेला नहीं होगा। जो आशूरा के दिन आंखों में असमद लगाये (एक किस्म का सुर्खी मायल सियाह पत्थर है जिससे सुरमा तैयार होता है) तो साल भर तक उसकी आंखें खराब ना होंगी। और हां जो आदमी आशूरा के दिन किसी बीमार की पुरसी के लिये गया गोया उसने तमाम औलाद आदम की अयादत की जो आदमी आशूरा के दिन एक घूंट भी किसी शख्स को पानी पिलाये गोया उसने पलक झपकने के बराबर भी अल्लाह की ना फरमानी नहीं की।

यौम आशूरा की नमाज़

यौम आशूरा (यानि दसवीं मुहर्रमुल हराम) के रोज़ा के बारे में बेशुमार फज़ायल आई है कि यही वह रोज़ा है जिसको रमज़ानुल मुबारक के रोज़ा के बाद इसीको वह फज़ीलत मिली है इसी रोज़े की अहमियत है।

जो शख्स यौमे आशूरा के दिन चार रिकाअतें इस तरह अदा करे कि हर रिकअतें में एक बार सूरह फातिहा और पचास बार सूरह एखलास पढ़ेगा अल्लाह तआला उसके पचास बरस के गुजिश्ता के और पचास साल बाद के गुनाह बख्श देता है, और ऊपर की दुनिया में उसके लिये एक हज़ार नूरानी महल बनायेगा। फिर आगे दूसरी हदीस बयान फरमाते है कि चार रिकाअतें इस तरह पढ़े कि हर रिकाअत में सूरह फातेहा सूरह ज़ुलज़ाल। सूरह काफिरून और सूरह एखलास एक एक बार पढ़े और फरागत पर (पढ़ने के बाद) सत्तर बार बारगाहे-रिसालत मआब में यह दरूद भेजे तो उसको अल्लाह तआला बहुत सवाब अता फरमाता है इस रवायत को हज़रत अबु हुरैरा ने रवायत फरमायी।

यौमे आशूरा का रोज़ा और शबे-बेदारी

हज़रत अबु हुरैरा रज़ी अल्लाह अन्हों से रवायत है कि प्यारे आका जनाब मोहम्मद रसूल अल्लाह ने फरमाया कि क़ौम बनी इसराईल पर एक दिन का रोज़ा फर्ज़ किया गया और वह मुहर्रम की दस तारीख यौम आशूरा है, उस दिन तुम भी रोज़ा रखो और घर वालों पर खाने में फराखी करो (यानि यह कि दिल से खर्च करो) जो शख्स आशूरा के दिन अपने माल से घर वालों पर फराखी करता है अल्लाह तआला उसे पूरा साल फराखी अता फरमाता है और जो उस दिन रोज़ा रखेगा तो वह रोज़ा चालिस साल का कुफ्फारा बनता है, और जो शख्स आशूरा की रात एबादत करे और दिन में रोज़ा रखे तो उसे यूं मौत आयेगी कि उसे एहसास तक ना होगा, हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ी अल्लाह अन्हों से मरवी है कि नबी अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जो शख्स ज़िलहिज्जा के आख़िरी महीने और मुहर्रम के पहले दिन रोज़ा रखे उसने गुज़रे हुये साल का एख़्तेताम और नये साल का इफ़्तेताह रोज़े से किया, अल्लाह तआला उसे पचास सालों का कुफ्फारा बना देगा।

यौमे आशूरा फजायल और अहले-बैत से हुस्न सुलूक का इनआम

उस दिन हज़रत इमाम हुसैन इब्न अली रज़ी अल्लाह अन्हों शहीद किये गये। हज़रत उम्मे सलमा रज़ी अल्लाह अन्हा से मरवी है फरमाती हैं कि प्यारे आका जनाब मोहम्मद रसूल अल्लाह मेरे कमरे में थे, हज़रत इमाम हुसैन रज़ी अल्लाहो अन्हों दाखिल हुये मैंने दरवाजे से देखा तो वह आप के सीना अक़दस पर चढ़े हुए थे और खेल रहे थे हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के दस्ते मुबारक में मिट्टी का एक टुकड़ा था और आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के आंसू जारी थे। जब हज़रत हुसैन रज़ी अल्लाहो अन्हों बाहर तशरीफ ले गये तो मैं अन्दर आई और मैंने पूछा। या रसूल अल्लाह मेरे मां बाप आप पर क़ुरबान हों। मैंने देखा कि आप के हाथ में मिट्टी का एक टुकड़ा है और रो रहे हैं। तो आप सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया कि जब मेरे सीने पर हुसैन खेल रहे थे और मैं खुश था कि इतने में हज़रत जिबराईल अलैहिस्सलाम ने आकर मुझे उस जगह की मिट्टी दी जहां यह शहीद किये जायेंगे मैं बस यही सुन कर रो रहा था।

फिर आगे हज़रत हुसैन बसरी रहमतुल्लाह अलैहि फरमाते हैं कि सुलेमान अब्दुल मालिक ने नबी अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम को ख़्वाब में देखा कि हुज़ूर उसे खुश खबरी दे रहे हैं और उस पर मेहरबानी फरमा रहे हैं। जब सुबह हुई तो उन्हों ने हज़रत हुसैन रज़ी अल्लाह अन्हो से इस बारे में पूछा तो उन्होंने फरमाया कि शायद तूने रसूल अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के अहले-बैत के साथ कोई नेकी की है उन्होंने कहा कि हां मैंने यज़ीद इब्न मउवीय के खज़ाना में हज़रत हुसैन रज़ी अल्लाह अन्हों का सरे अनवर या तो मैंने उसे दिबाज़ के पांच कपड़े पहनाने के बाद अपने साथियों के साथ उस पर नमाज़ पढ़ी और क़ब्र में दफन कर दिया हज़रत हसन रज़ी अल्लाह अन्ह ने फरमाया कि उस अमल के बाइस नबी अकरम सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम तुमसे खुश हुये हैं इस पर सुलेमान इब्ने अब्दुल मालिक ने हज़रत हसन रज़ी अल्लाह अन्हो से अच्छा सुलूक किया और इनआमात देने का हुक्म दिया।

अबु नसर ने अपने वालिद से उन्हों ने अपनी पसंद के साथ असामा से उन्होंने हज़रत जाफर इब्ने रहमतुल्लाह से रवायत किया वह फरमाते है कि हज़रत इमाम हुसैन रज़ी अल्लाहो अन्हों की शहादत के बाद आपकी क़ब्र पर सत्तर हज़ार फरिश्ते उतरे जो क़यामत तक आप के लिये रोते रहेंगे।

आशूरा के रोज़े पर तान करना गलत है

इस अज़ीम दिन की अज़मत और इसके रोज़े पर तान किया है इनका ख़याल है कि चूंकि इस दिन हज़रत इमाम हुसैन की शहादत हुई लिहाज़ा यह रोज़े जायज़ नहीं। वह कहते हैं आप की शहादत की वजह से इस दिन हमागीर अंदाज में रंज व ग़म के खौफ का इज़हार होना चाहिये जबकि तुम इस दिन खुशी मनाते हो और अहलो व अयाल पर रिज़्क की कुशादगी और कसीर नुफका नीज़ फ़ुक़राये और जईफ व मिस्कीन लोगों पर सदका करने का हुक्म देते हो मुसलमानों पर जो इमाम हुसैन का हक है इस का यह तकाज़ा नहीं। यह बात कहने वाले निहायत खताकार हैं और उसका मज़हब निहायत बुरा और फासिद है क्योंकि अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम पर इस दिन शहादत का शर्फ अता फरमाया जो इसके नज़दीक निहायत अज़मत व बुजुर्गी वाला है।

अगर आप के यौमे-शहादत को मातम व मुसीबत का दिन बनाना जायज होता तो सोमवार का दिन इस बात का ज्यादा मुस्तहक था क्योंकि इस दिन अल्लाह ताआला ने अपने महबूब सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम रूहे-मुबारक कब्ज फरमाया इस तरह इस दिन हज़रत अबु बकर सिद्दीक रज़ी अल्लाह अन्हो का विसाल हुआ हज़रत आइशा सिद्दीका रज़ी अल्लाह तआला अन्हा फरमाती हैं कि हज़रत अबु बकर सिद्दीक रज़ी अल्लाह अन्हों ने मुझसे पूछा कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का विसाल कब हुआ तो मैंने अर्ज़ किया कि सोमवार के दिन तो हज़रत अबु बकर सिद्दीक रज़ी अल्लाह अन्हो ने फरमाया कि मेरा विसाल भी इसी दिन होगा। चुनांचे आप का विसाल भी इस दिन यानि कि सोमवार को हुआ। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात और हज़रत अबु बकर सिद्दीक रज़ी अल्लाह अन्हों की वफात दूसरों की वफात से ज़्यादा अज़ीम है मगर सोमवार की फज़ीलत और उस दिन रोज़े की अहमियत पर सब लोगों का इत्तेफाक है इसी दिन आमाल भी पेश किये जाते हैं जुमेरात के दिन बन्दों के आमाल उठाये जाते हैं।

इस बात से यह पता चला कि मुहर्रमुल हराम की दसवीं तारीख को रंज व ग़म की तरह ना मनायें बल्कि आप जितना ज़्यादा हो सके ज़्यादा से ज़्यादा कुरआन पाक की तिलावत करें और वज़ायफ का विर्द करें कुरआन ख़्वानी करायें और तमाम मैदाने-करबला में शहीद होने वाले शहीदों के नाम फातिहा व ईसाले-सवाब करायें इसी तरह आप खुशी का इज़हार करें ना कि ढोल ताशा नगारा बजाकर सीना ज़नी मातम कर ताजिया उठाकर यह सब नाजायज़ व हराम है यह सब करने पर कल आपकी मैदाने-महशर में पकड़ होगी। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि आप मुहर्रमुल हराम . ना मनायें बल्कि मुहर्रमुल हराम में जो चीज़ें हराम हैं वह ना करें और दूसरों को भी इस चीज़ के करने से रोकें। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि मुहर्रम ना मनायें ज़रूर मनायें मगर मनाने वालों की तरह जिस तरह मनाने का तरीका है खिचड़ा पकवायें ईसाले-सवाब करवायें फातिहा दिलायें कुरआन पाक ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ें और पढ़वायें आप शोहदाए-करबला वालों के नाम ईसाले-सवाब करायें। उनके नाम पर गरीबों मिस्कीनों को पैसा कपड़ा जिस तरह हो सके उनकी मदद करें ताकि जो फुजूल खर्ची है इससे आप बचे और वही पैसा किसी गरीब की लड़की की शादी में सर्फ हो किसी बेवा का सहारा बन जाये किसी यतीम की परवरिश में लगे जाये किसी लावारिस लाश को दफनाने में काम आ जाये किसी मदरसे के तालीबे इल्म को दे दें जिस का कि कोई खर्च चलाने वाला ना हो लिहाजा बहुत सारे रास्ते हैं जायज़ तरीके से पैसा खर्च करने के लिये और आप को इसका ज़्यादा से ज़्यादा सवाब भी मिल जायेगा कल मैदाने-आखरत में उस दिये हुये पैसे की नेकी भी काम आ जायेगी दीन व दुनिया दोनों जगह में आपकी सुर्खरूई होगी और अगर इसी पैसा को आप गलत ढंग से इस्तेमाल करते हैं तो यकीन कीजिये कल मैदान महशर में इसका आपको जवाब देना होगा जिसका आप कभी जीते जी तो जवाब ना दे पाओगे तो मरने के बाद कहां से जवाब दे पाओगे तो आप हत्तल इम्कान कोशिश करें कि कोई मुझसे जान बूझ कर गलती ना होने पाये और कोई अनजाने में अगर गलती हुई हो तो उसका मालिक खुदा है माफ करने वाला गफूरूर रहीम है। अब आगे मेरे जहन में एक बात और गूंज रही है दोस्तों के लोग कहते है कि मुझे दीन के बारे में कुछ मालूमात नहीं मैं नमाज पढ़ना नहीं जानता वज़ू करना नहीं जानता, दीन की बातें नहीं जानता तो मैं आप लोगों से पूछता हूं कि आप लोग दीन की बातें क्‍यों नहीं जानते क्या अल्लाह तआला ने आपको इसके लिये छूट दे रखी है कि आप दीन की बातें नहीं जानते तो कोई बात नहीं। नहीं मेरे दोस्तों हरगिज हरगिज ऐसा नहीं होगा बल्कि अल्लाह तबारक व तआला आप से ज़रूर सवाल करेगा मैंने तुम को दुनिया में भेजा था एबादत करने के लिये ना कि सिर्फ और सिर्फ पेट भरने के लिये मेरे दोस्तों याद रखो अल्लाह तबारक व तआला कुरआन पाक में बेबांग दोहल एलान कर रहा है, और मैंने जिन्न इन्सान को इस लिये पैदा किया है ताकि वह मेरी बन्दगी करें यह दुनिया हमारी रहाईशगाह नहीं है बल्कि दरहकीकत इम्तेहानगाह है जिस तरह हम किसी चीज का इम्तेहान देने जाते है और हम फेल होकर चले आते है मुंह फूला होता है किसी से बात करने की तबीयत नहीं करती है फिर भी यहां एक नहीं दस बार 50 बार 100 बार इम्तेहान दीजिये और फेल होकर फिर भी इम्तेहान देने वाली कतार में आकर खड़े हो जाते हैं लेकिन याद रखिये जिस इम्तेहान के लिये अल्लाह तआला ने हमें और आपको दुनिया में भेजा है इस इम्तेहान में फेल होने के बाद फिर हमें दोबारा मौका किसी कीमत पर नहीं दी जायेगी कि दुनिया में जाओ और जाकर तैयारी करो बल्कि वहीं फैसला सुना दिया जायेगा कि किसे सज़ा मिली और किसे जज़ा मिली। इस लिये मेरे दोस्तों ऐसा काम ना करो कि कल मैदाने-महशर में फेल होने की नौबत आये और वहां तुम सज़ा के मुस्तहक़ करार दिये जाओ।

दसवीं मुहर्रम को मजलिस मुनअकिद करना जायज़ है

अशरए-मुहर्रम में मजलिस मुनअकिद करना और मजलिस मीलाद करना वाकेआते-करबला बयान करना जबकि रवायत सही बयान किये जायें जायज़ है। उन वाकेआत में सब्र व तहम्मुल रज़ा व तसलीम का बहुत मुकम्मल दरस है एहकामे-शरीअत की पाबंदी और इत्तेबा सुन्नत का जबरदस्त अमली सुबूत है। क्योंकि दीन हक़ की हिफाज़त में तमाम अज़ीज़ व अक़राबा व रुफ़क़ा और खुद अपने को उन लोगों ने राहे-खुदा में कुरबान किया और जज़ा व फज़ा का नाम भी ना आने दिया, मगर उन दोनों की मजलिस में सहाबए-केराम रज़ी अल्लाह तआला अन्हुमा का भी ज़िक्र खैर होना चाहिये। ताकि अहले-सुन्नत व शीयों की मजलिस में फर्क व इम्तियाज रहे।

ताजियादारी में क्या सही क्या गलत

ताजियादारी के वाकेआते करबला में तरह-तरह की ढांचे बनाते हैं और उसको हज़रत सैयदना इमाम हुसैन रज़ी अल्लाहो अन्हो की रौज़ए पाक की तशबीह कहते हैं कहीं तख्त बनाये जाते हैं कहीं ज़रीह बनती है और अलम और शदे निकाले जाते हैं, ढोल ताशे और किस्म-किस्म के बाजे बजाते हैं ढोल ताशा पूरे साल कहीं नहीं दिखता हो मुहर्रम के मौका पर देख लीजिये ताजियों का बहुत धूम धाम से गश्त होता है आगे पीछे होने में जाहलियत से झगड़े होते हैं कभी दरख्त की शाखें काटी जाती हैं कहीं चबूतरे खोदवा दिये जाते हैं ताजियों से मन्नत मानी जाती है, सोने चांदी से अलम बनवाये जाते हैं, हार, फूल, नारियल चढ़ाते हैं। वहां जूते पहन कर जाने को गुनाह जानते हैं। बल्कि वहां जूते पहनकर जाने से शिद्दत से मना भी करते हैं कि ऐसे गुनाह पर भी ममानअत नहीं करते लगाने को बहुत बुरा जानते हैं।

एक मिम्बर पर मिम्बर गलाफ और एक पर सुर्ख गलाफ डालते हैं और सब्ज़ गलाफ वाली को हज़रत सैयदना इमाम हसन रज़ी अल्लाहो अन्हो की कब्र और सुर्ख गलाफ वाली को हज़रत सैयदना इमाम हुसैन रज़ी अल्लाहो अन्हो की कब्र या शबीह कब्र बताते हैं और वहां शर्बत मलीदा वगैरह पर फातिहा दिलवाते हैं यह तसव्वुर करके हज़रत इमाम आली मकाम का रौज़ा और मवाजा अकदस में फातिहा दिला रहे हैं फिर यह ताजिया दसवीं तारीख को मसनूई करबला में ले जाकर दफ़न करते हैं गोया कि यह जनाज़ा था जिसे दफ़न कर आये फिर तीजा दसवीं चालिसवां सब कुछ किया जाता है और हर एक खुराफात पर मुश्तमिल होता है।

हज़रत कासिम रज़ी अल्लाह अन्हो की मेंहदी निकालते हैं गोया उनकी शादी हो रही है और मेंहदी रचाई जायेगी और इसी ताजियादारी के सिलसिले में कोई पेक बनता है जिसके कमर से घुंघरू बंधे होते हैं गोया हज़रत इमाम आली मकाम का कासिद और हरकारा है जो यहां से खत लेकर इब्ने ज़ियाद या यज़ीद के पास जायेगा और वह हरकारों की तरह भागा भागा फिरता है, किसी बच्चा को फकीर बनाया जाता है उसके गले में झोली डालते हैं और घर-घर उससे भीक मंगवाते हैं कोई सक्का बनाया जाता है छोटी सी मुश्क उसके कंधे से लटकती है गोया यह दरियाए फरात से पानी भरकर लायेगा किसी इल्म पर मुश्क लटकती है और उसमें तीर लगा होता है गोया यह हज़रत अब्बास अलमदार है कि फरात से पानी ला रहे हैं और यज़ीदों ने मुश्क को तीर से छेद दिया है। इसी किस्म की बहुत सी बातें की जाती हैं। यह सब लग्व व खुराफात हैं उनसे हरगिज़ सैयदना हज़रत इमाम हुसैन रज़ी अल्लाह अन्हो खुश नहीं यह तुम खुद गौर करो कि उन्होंने अहया दीन व सुन्नत के लिये यह जबरदस्त कुरबानियां दीं। और तुम मआज़ अल्लाह उनको बिदआत का ज़रिया बना लिया, बाज जगह इसी ताजियादारी के सिलसिले में बुराक बनाया जाता है जो अजीब किस्म का मुजस्समा होता है कि कुछ हिस्सा इन्सानी शक्ल का होता है और कुछ हिस्सा जानवरों की शक्ल के जैसा शायद यह हज़रत इमाम आली मकाम की सवारी के लिये जानवर होगा कहीं दुलदुल बनता है और कहीं बड़ी-बड़ी कब्रें बनती हैं और बाज जगह आदमी रीछ बंदर लंगूर बनते हैं और कूदते फिरते हैं जिसको इस्लाम में तो इस्लाम इन्सानी तहज़ीब भी जायज़ नहीं रखती। ऐसी बुरी हरकत इस्लाम हरगिज़ जायज़ नहीं रखता। अफसोस यह मोहब्बत अहले बैत का दावा और ऐसी बेजा हरकतें यह वाकया तुम्हारे लिये नसीहत था, और तुमने उसको खेल तमाशा बना लिया। इसी सिलसिले में नौहा व मातम भी होता है और सीना कोबी होती है इतनी जोर-जोर से सीना कूटते हैं कि वर्म हो जाता है सीना सुर्ख हो जाता है बल्कि बाज जगह जंजीरों और छूरियों से मातम करते हैं कि सीना से खून बहने लगता है। ताजियों के पास मरसिया पढ़ा जाता है मरसिया में गलत वाकआत नज़्म किया जाता है और ताजिया जब गश्त को निकलता है उसी वक्त भी उसके आगे मरसिया पढ़ा जाता है मरसिया में गलत वाकआत नज़्म किये जाते हैं अहले-बैत-केराम की बेहुरमती और सब्ब और जज़ा व फज़ा का ज़िक्र किया जाता है और चूंकि मरसिया राफिज़ियों ही के हैं बाज में तबर्रा भी होता है मगर उस रौ में सुन्नी भी उसे बेतकल्लुफ पढ़ जाते हैं यह सब नाजायज़ व गुनाह के काम हैं।

इज़हारे ग़म के लिये सर के बाल बिखेरते हैं कपड़े फाड़ते और सर पर खाक डालते और भूसे उड़ाते हैं यह सब भी नाजायज़ और जाहिलियत के काम हैं उनसे बचना निहायत ज़रूरी है अहादीस में इसकी सख्त ममानअत आई है मुसलमान पर लाज़िम और ज़रूरी है कि उन कामों से परहेज करें जिससे अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम राज़ी हों यही निजात का रास्ता है ताजियों और अलम के साथ बाज लोग लंगर लुटाते हैं यानि रोटियां या बिस्कीट या और कोई चीज़ ऊंची जगह से फेंकते हैं यह नाजायज़ है कि रिज़्क़ की सख्त बेहुरमती होती है यह चीज़ें कभी नालियों में भी गिरती हैं और अकसर लूटने वालों के पांव के नीचे भी आती हैं और बहुत कुछ कुचल कर जाये हो जाती हैं अगर यह चीज़ें इन्सानियत के तरीके पर फुक़रा को तकसीम की जायें तो बेहुरमती भी ना हो और जिनको दिया जाये उन्हें फायदा भी पहुंचे मगर वह लोग इसी तरह लुटाने को अपनी नेक नामी तसव्वुर करते हैं। (बहारे शरीअत जिल्द नं0 16)

हिकायात :- एक शख्स ने आशूरा के रोज़ सात दिरहम खैरात किये और साल भर उसके एवज़ (बदला) का इन्तेज़ार करता रहा जब दोबारा आशूरा का दिन आया तो उसने एक आलिमे दीन से सुना कि वह फरमा रहे हैं कि जो शख्स दिन एक दिरहम खैरात करेगा। अल्लाह तआला उसे उसके बदले में एक हजार दिरहम अता फरमायेगा। तो उसने कहा मैं यह बात तसलीम नहीं करता। क्योंकि मैंने पिछले आशूरा के दिन सात दिरहम खैरात किये थे और पूरा साल गुज़र गया है मगर मुझे उसके बदले कुछ नहीं मिला जब रात आई तो एक आदमी सात हज़ार दिरहम लेकर उस शख्स के पास आया और कहा ऐ झूठे यह सात हज़ार दिरहम पकड़। अगर तू क़यामत तक सब्र करता तो तेरे लिये बेहतर होता तूने सब्र ना किया।

दुआ :- पहली मुहर्रमुल हराम को जो दुआ पढ़े तो शैतान लईन से महफूज़ रहे और यह सारा साल दो फरिश्ते उसकी हिफाज़त पर मुकर्रर हों। ये दुआ है

Arabic dua

दसवीं मुहर्रम का फातिहा

माहे मुहर्रम में दस दिनों तक ख़ुसूसन दसवीं को हज़रत सैयदना इमाम हुसैन रज़ी अल्लाहो अन्हो व दीगर शोहदाए करबला को ईसाले सवाब करते हैं, कोई शर्बत पर फातिहा दिलाता है कोई शीरीनी पर फातिहा दिलाता है कोई मिठाई पर कोई रोटी और गोश्त पर । जिसपर चाहो फातिहा जायज़ है उनको जिस तरह चाहो ईसाले सवाब करो जायज़ है, बहुत सारे लोग पानी और शर्बत की सबील लगा देते हैं, जाड़ों में चाय पिलाते हैं, खिचड़ा पकवाते हैं जो कारे खैर करो और सवाब पहुंचाओ उन सब को नाजायज़ नहीं कहा जा सकता बाज जाहिलों में मशहूर है कि मुहर्रम में सिवाये शोहदाए करबला के दूसरों के नाम फातिहा ना दिलाई जाये उनका खयाल बिलकुल गलत है जिस तरह दूसरे दिनों में सब की फातिहा हो सकती है इन दिनों में भी सब की फातिहा हो सकती है।